वराह पुराण का काल-निर्धारण

Authors

  • मूर्ति
  • डाॅ॰ बबलू शर्मा

Keywords:

सर्ग, प्रतिसर्ग, मन्वन्तर, वंशानुचरित, अन्तराणि, संस्था

Abstract

भारतीय धर्म तथा संस्कृति के स्वरूप को जानने के लिए पुराणों का अनुषीलन अत्यन्त आवश्यक है। पुराण भारतीय साहित्य का गौरव ग्रन्थ है। प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष में पुराणों का पठन-पाठन एंव श्रवण मनन होता आया है। सामान्य भारतीय के हृदयतल में ज्ञान, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, सदाचरण तथा धर्म-परायणता के उत्तम तत्त्वों का संस्कार पुराणों ने ही प्रतिष्ठित किया है। पुराणों के विषय में वेदव्यास ने तो स्कन्दपुराण में यहाँ तक कह दिया कि जो वेदों में नहीं देखा गया, जो स्मृतियों में भी नहीं देखा गया तथा जो दोनों में नहीं देखा गया, वे सब भी पुराणों में सन्निहित है।

References

नारद पुराण, पूर्व भाग अध्याय 103/1-14

पुराण-विमर्श पृ॰ 154

धर्मशास्त्र का इतिहास-चतुर्थ भाग, पृ॰ 423

अष्टादश पुराण दर्पण, पृ॰ 287

पुराण-विमर्श पृ॰ 558

Downloads

How to Cite

मूर्ति, & डाॅ॰ बबलू शर्मा. (2026). वराह पुराण का काल-निर्धारण. Kavya Setu, 2(5), 38–43. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/238

Issue

Section

Original Research Articles