वराह पुराण का काल-निर्धारण
Keywords:
सर्ग, प्रतिसर्ग, मन्वन्तर, वंशानुचरित, अन्तराणि, संस्थाAbstract
भारतीय धर्म तथा संस्कृति के स्वरूप को जानने के लिए पुराणों का अनुषीलन अत्यन्त आवश्यक है। पुराण भारतीय साहित्य का गौरव ग्रन्थ है। प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष में पुराणों का पठन-पाठन एंव श्रवण मनन होता आया है। सामान्य भारतीय के हृदयतल में ज्ञान, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, सदाचरण तथा धर्म-परायणता के उत्तम तत्त्वों का संस्कार पुराणों ने ही प्रतिष्ठित किया है। पुराणों के विषय में वेदव्यास ने तो स्कन्दपुराण में यहाँ तक कह दिया कि जो वेदों में नहीं देखा गया, जो स्मृतियों में भी नहीं देखा गया तथा जो दोनों में नहीं देखा गया, वे सब भी पुराणों में सन्निहित है।
References
नारद पुराण, पूर्व भाग अध्याय 103/1-14
पुराण-विमर्श पृ॰ 154
धर्मशास्त्र का इतिहास-चतुर्थ भाग, पृ॰ 423
अष्टादश पुराण दर्पण, पृ॰ 287
पुराण-विमर्श पृ॰ 558
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