वैदिक पर्यावरण-दृष्टि

Authors

  • डॉ सुरेश कुमार

Keywords:

वेद, पर्यावरण, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, प्रकृति संरक्षण

Abstract

भारतीय समाज एवं संस्कृति के निर्माण तथा उसके आदर्श प्रतिमानों के निर्धारण में वेदों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। वे भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रमुख स्रोत हैं, जिनमें मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वैदिक साहित्य में वायु, जल, वन, नदियों, पृथ्वी तथा समस्त जीव-जगत् के संरक्षण को महत्त्व प्रदान किया गया है। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण विश्वव्यापी चिंता का विषय बन चुका है।1 वैश्विक तापवृद्धि, वायु एवं जल-प्रदूषण, ओजोन परत का क्षय तथा जैव-विविधता की हानि जैसी समस्याएँ मानव जीवन और प्रकृति के लिए गंभीर चुनौती हैं। वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय चेतना को सुदृढ़ किया। भारत ने भी 1986 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू किया।2 अतः वर्तमान पर्यावरणीय संकट के समाधान तथा प्रकृति-संरक्षण की चेतना विकसित करने में वैदिक पर्यावरण-दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

References

पर्यावरण भारत की भूमिका, प्राक्कथन पृष्ठ नंबर 4, कमलनाथ (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार ,1995)

संस्कृति एवं पर्यावरण पृष्ठ नंबर 152, हरिश्चंद्र व्यास, 1993

अथर्ववेद (12 काण्ड,1 सूक्त, 12 मंत्र)

अथर्ववेद (12 काण्ड, 1 सूक्त, 26 मंत्र)

शुक्ल यजुर्वेद (13 अध्याय, 18 मन्त्र)

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How to Cite

डॉ सुरेश कुमार. (2025). वैदिक पर्यावरण-दृष्टि. Kavya Setu, 1(12), 227–237. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/372

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Original Research Articles