डॉ. मिथिलेश शर्मा का संस्कृत साहित्य में सामाजिक अवदान : एक विवेचन
Keywords:
स्थापित, आवश्यकताओं, संस्कृत साहित्य, वर्तमान समाज, संवेदनशीलता, नैतिक पतन, शैक्षिक एवं सामाजिकAbstract
भारतीय संस्कृति की आत्मा संस्कृत साहित्य में निहित है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान–परंपरा, दर्शन, धर्म, नीति, साहित्य, विज्ञान तथा सामाजिक मूल्यों की संवाहिका रही है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक संस्कृत साहित्य ने भारतीय समाज को नैतिकता, सदाचार, सहिष्णुता, समन्वय और मानव कल्याण की दिशा प्रदान की है। यद्यपि आधुनिक युग में सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों के कारण संस्कृत भाषा के उपयोग में कमी आई, तथापि अनेक विद्वानों ने अपने साहित्यिक, शैक्षिक एवं सामाजिक कार्यों के माध्यम से संस्कृत को पुनः जनमानस से जोड़ने का प्रयास किया। ऐसे विद्वानों में डॉ. मिथिलेश शर्मा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
डॉ. मिथिलेश शर्मा आधुनिक संस्कृत साहित्य के उन विद्वानों में गिने जाते हैं जिन्होंने संस्कृत भाषा एवं साहित्य को केवल परंपरागत अध्ययन तक सीमित न रखकर उसे समाजोपयोगी स्वरूप प्रदान किया। उनका साहित्यिक चिंतन भारतीय संस्कृति की मूल चेतना से अनुप्राणित है, जिसमें समाज सुधार, नैतिक जागरण, मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने अपने लेखन, शिक्षण एवं सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से संस्कृत साहित्य को लोकजीवन के निकट लाने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है।
वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार की समस्याओं—जैसे नैतिक पतन, सांस्कृतिक विस्मृति, पारिवारिक विघटन, भौतिकवाद एवं मानवीय संवेदनाओं के ह्रास—से जूझ रहा है, तब संस्कृत साहित्य की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। संस्कृत साहित्य में निहित “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” तथा “लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु” जैसे आदर्श आज भी मानव समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। डॉ. मिथिलेश शर्मा ने अपने साहित्यिक अवदान द्वारा इन आदर्शों को आधुनिक समाज से जोड़ने का प्रयास किया है। उनके साहित्य में सामाजिक चेतना, राष्ट्रीय भावना, सांस्कृतिक संरक्षण तथा मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
डॉ. मिथिलेश शर्मा का सामाजिक अवदान बहुआयामी है। एक ओर वे संस्कृत भाषा के प्रचार–प्रसार के लिए निरंतर सक्रिय रहे, वहीं दूसरी ओर उन्होंने संस्कृत साहित्य को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का प्रयास किया। उनके द्वारा रचित साहित्य में समाज की समस्याओं, जनजीवन की परिस्थितियों तथा मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति अत्यंत प्रभावशाली ढंग से हुई है। उन्होंने संस्कृत को केवल धार्मिक या आध्यात्मिक भाषा के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन एवं जनजागरण का माध्यम माना। यही कारण है कि उनके साहित्य में लोकमंगल की भावना प्रमुख रूप से विद्यमान है।
References
डॉ.मिथिलेश शर्मा, पं० दीनदयाल उपाध्याय चरितम्, परिचय भाग
Dwivedi, B. (2005). Religious basis of Hindu beliefs. Diamond Pocket Books (P) Ltd.
Sriramesh, K., & Yeo, S. L. (Eds.). (2024). Crisis Communication Cases from Asia: A Cultural Approach. Taylor & Francis.
डॉ० मिथिलेशाचार्य, स्वामिधर्मदेवचरितम् 3/13
डॉ० मिथिलेशाचार्य, स्वामिधर्मदेवचरितम् 3/22. पृ.-34
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