कृष्णापरिणयं महाकाव्य में द्रौपदी की प्रासंगिकता (आधुनिक परिप्रेक्ष्य में)
Keywords:
कृष्णापरिणय, स्वाभिमानी, महाकाव्य, स्वाधीन, प्राचीनकाल, शास्त्र प्रमाणिकAbstract
संस्कृत साहित्य में प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान समय तक अनेक महाकाव्य समय-समय पर लिखे जाते है। जिनका संस्कृत साहित्य को समृद्ध बनाने मे महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। संस्कृत साहित्य में कृष्णापरिणयं महाकाव्य भी भारतीय संस्कृति की पुष्टि करता है। संस्कृत साहित्य में प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज में नारी का महत्त्वपूर्ण स्थान बताया गया हैं। उसमें द्रौपदी भी एक नारी-पात्र है। पुरूष प्रधान समाज ने सदा ही उसे अपनी अद्र्धांगिनी बनाकर दबाने की कोशिश की है। संस्कृत साहित्य में प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान समय तक पुरूष मर्यादा से नारी मर्यादा सदा ही उत्कृष्ट मानी गयी है। रामायण, महाभारत इत्यादि अनेक महाकाव्यों मे भारतीय ऐतिहासिक ग्रन्थों तथा पुराणों मे पतिव्रत्य के प्रभाव से त्रिकालदर्शी सिद्धि सम्पन्न अनेक महान् नारियों के उदाहरण देखने को मिलते है, यथा- सती सावित्री, सीता, अनूसूया, सुलभा, अरून्धती, गार्गी, मैत्रयी, भारती, द्रौपदी, गान्धारी, अपाला, घोषा इत्यादि। इसके अतिरिक्त नारियों के प्रति सम्मान की बाते भी हमारे संस्कृत साहित्य में बताई गई है यथा-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रिया।।1
अर्थात जिस कुल मे नारियों की पूजा अर्थात् सत्कार होता है, उस कुल में दिव्यगुण, दिव्य भोग तथा उत्तम संतान होती है। अर्थात् वहाँ देवता निवास करते है। जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नही होती, वहाँ पर सभी कार्य निष्फल होते है।
References
मनुस्मृति, 3/46
कृष्णापरिणयं, 12/3
वहीं, 11/48
वहीं, 11/15
वहीं 12/2
वहीं, 12/3
वहीं, 12/41
वहीं, 12/44
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