भामह से मम्मट तक अलंकारशास्त्र का विकास: एक ऐतिहासिक विश्लेषण
Keywords:
मम्मट, अलंकार शास्त्र, काव्यालंकार, काव्यप्रकाश, रससिद्धांत, अलंकारसिद्धांत, काव्यपरिभाषा, गुण-दोष, रीति, वक्रोक्ति, संस्कृत काव्यशास्त्र, ऐतिहासिक विश्लेषणAbstract
"भामह से मम्मट तक अलंकारशास्त्र का विकास" विषय संस्कृत काव्यशास्त्र की ऐतिहासिक यात्रा को उद्घाटित करता है, जिसमें काव्य की परिभाषा, सौंदर्यबोध, रस-अलंकार की भूमिका तथा काव्य के तत्वों की अवधारणा समय के साथ कैसे परिवर्तित हुई, इसका विश्लेषण किया जाता है। यह शोध भामह (7वीं शताब्दी) से प्रारंभ होकर मम्मट (11वीं शताब्दी) तक की उस बौद्धिक परंपरा को समझने का प्रयास है, जिसने संस्कृत साहित्य के सौंदर्यशास्त्र को गहराई प्रदान की। भामह का काव्यालंकार ग्रंथ अलंकारों को काव्य का प्राण मानता है। उनके अनुसार अलंकार ही वह तत्व है जो काव्य को काव्यत्व प्रदान करता है। उन्होंने काव्य की परिभाषा को "शब्दार्थौ सगुणौ काव्यम्" के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें गुणयुक्त शब्द और अर्थ की संगति को काव्य का मूल माना गया। भामह की दृष्टि में रस की भूमिका गौण है, और वे अलंकारों की संख्या, प्रकार और प्रभाव पर विशेष बल देते हैं।
दूसरी ओर, मम्मट का काव्यप्रकाश ग्रंथ एक समन्वयवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। मम्मट ने रस को काव्य की आत्मा माना — "रसात्मकं काव्यम्" — और अलंकार, गुण, रीति, वक्रोक्ति, दोष आदि को सहायक तत्वों के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने काव्य की परिभाषा को व्यापक बनाया और काव्य के विभिन्न पक्षों को समन्वित रूप में प्रस्तुत किया। मम्मट की दृष्टि में काव्य केवल अलंकारों का समुच्चय नहीं, बल्कि भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। इस शोध में भामह और मम्मट के बीच के अन्य आचार्यों — जैसे दण्डी, वामन, उद्भट, रुद्रट आदि — की विचारधारा का भी संक्षिप्त विश्लेषण किया जाएगा, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि काव्यशास्त्र की धारा किस प्रकार क्रमिक रूप से विकसित हुई। शोध का उद्देश्य केवल तुलनात्मक विश्लेषण करना नहीं है, बल्कि यह भी समझना है कि सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक परिवेश ने इन आचार्यों की दृष्टियों को कैसे प्रभावित किया। यह अध्ययन संस्कृत साहित्य के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और अध्यापकों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है, जो काव्यशास्त्र की गूढ़ता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहते हैं। साथ ही, यह आधुनिक साहित्यिक सिद्धांतों के साथ संवाद स्थापित करने की दिशा में भी एक प्रयास होगा।
References
भामह – काव्यालंकार: अलंकारों को काव्य का प्राण मानने वाला प्रारंभिक ग्रंथ।
मम्मट – काव्यप्रकाश: रस को काव्य की आत्मा मानते हुए समन्वयवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
दण्डी – काव्यादर्श: गुणों और रीतियों के माध्यम से काव्य की शोभा पर बल देता है।
वामन – काव्यालंकारसूत्रवृत्ति: रीति को काव्य की आत्मा घोषित करने वाला सूत्रात्मक ग्रंथ।
उद्भट – काव्यालंकारसंग्रह: अलंकारों के वर्गीकरण और प्रयोग की सूक्ष्म व्याख्या करता है।
रुद्रट – काव्यालंकार: अलंकारों की संख्या और नवीन प्रयोगों पर विस्तृत दृष्टि।
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