शासकीय एवं अशासकीय विद्यालयों के विद्यार्थियों के पारिवारिक आर्थिक स्तर का तुलनात्मक परिमाणात्मक विश्लेषण।
Keywords:
आर्थिक स्तर, शासकीय एवं अशासकीय विद्यालय, परिमाणात्मक शोध, प्रतिशत विश्लेषण, आर्थिक स्थिति मापन-सूचकांक, टी-परिक्षण, तुलनात्मक अध्ययन, अनुसूचित जाति/जनजाति, छिंदवाड़ा जिला, सामाजिक-आर्थिक समानता, क्षेत्रीय विश्लेषण।Abstract
यह परिमाणात्मक अध्ययन मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों के शासकीय और अशासकीय विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के पारिवारिक आर्थिक स्तर के तुलनात्मक और सांख्यिकीय विश्लेषण के लिए आयोजित किया गया। अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य यह आकलन करना था कि क्या विद्यालय का प्रकार विद्यार्थियों की पारिवारिक आर्थिक पृष्ठभूमि का निर्णायक संकेतक है अथवा नहीं।अध्ययन के ढाँचे में वर्णनात्मक, तुलनात्मक और अनुमानात्मक सांख्यिकीय तकनीकों का समेकित उपयोग किया गया, जिनमें प्रतिशत विश्लेषण, माध्य, मानक विचलन और टी-परिक्षण सम्मिलित हैं। डेटा संग्रह हेतु कुल 300 विद्यार्थियों का चयन किया गया, जिनमें 150 विद्यार्थी शासकीय और 150 विद्यार्थी अशासकीय विद्यालयों से शामिल थे। चयन प्रक्रिया स्तरीकृत यादृच्छिक नमूना पद्धति के माध्यम से सम्पन्न की गई, ताकि छिंदवाड़ा जिले के अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों के विभिन्न आर्थिक वर्गों का संतुलित और समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।विद्यार्थियों के पारिवारिक आर्थिक स्तर का परिमाणात्मक आकलन करने के लिए “आर्थिक स्थिति मापन-सूचकांक” विकसित किया गया, जिसमें परिवार की मासिक आय, आवासीय स्थिति, पारिवारिक संपत्ति, उपभोग व्यय और घरेलू सुविधाओं के पाँच उप-मानदंड सम्मिलित किए गए। इस सूचकांक ने आर्थिक स्थिति के व्यापक, सुसंगत और तुलनात्मक मापन की वैज्ञानिक आधारशिला प्रदान की।अध्ययन के परिणाम संकेत करते हैं कि शासकीय और अशासकीय विद्यालयों के विद्यार्थियों के पारिवारिक आर्थिक स्तर में लघु-स्तरीय भिन्नताएँ अवश्य देखी गईं, किन्तु टी-परिक्षण के अनुसार ये भिन्नताएँ p > 0.05 स्तर पर सांख्यिकीय दृष्टि से असार्दिक पाई गईं। यह निष्कर्ष मुख्य परिकल्पना का समर्थन करता है कि छिंदवाड़ा जिले के अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों के विद्यार्थियों के पारिवारिक आर्थिक स्तर में शासकीय और अशासकीय विद्यालयों के बीच कोई सार्थक अंतर नहीं है।अध्ययन से यह भी संकेत मिलता है कि सामाजिक-आर्थिक समानता और क्षेत्रीय न्यायसंगत वितरण के दृष्टिकोण से विद्यालय का प्रकार निर्णायक कारक नहीं रहा है। नीति-निर्माताओं, शैक्षिक योजनाकारों और सामाजिक नीतिकारों के लिए यह अध्ययन स्पष्ट संदेश देता है कि विद्यालय-केंद्रित आर्थिक अंतराल पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, छिंदवाड़ा जिले के अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों के समग्र सामाजिक-आर्थिक उत्थान, वित्तीय समावेशन और शिक्षा-सुलभता पर विशेष बल दिया जाना आवश्यक है।
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