लोकगीतों की ऐतिहासिक उत्पत्ति, विकास क्रम और परंपरागत स्वरूप
Keywords:
लोकगीत, उत्पत्ति, विकास क्रम, परंपरागत स्वरूप, सांस्कृतिक धरोहरAbstract
लोकगीत मानव सभ्यता के आरंभ से ही सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हिंदी लोकगीतों की ऐतिहासिक उत्पत्ति मानव के सामूहिक जीवन और उसकी भावनात्मक अभिव्यक्तियों से जुड़ी मानी जाती है। जब लिखित परंपरा का विकास नहीं हुआ था, उस समय लोकगीतों ने मौखिक परंपरा के माध्यम से समाज की स्मृतियों, अनुभवों और मान्यताओं को संरक्षित किया। ये गीत जीवन के हर पहलू – जन्म, विवाह, ऋतु परिवर्तन, उत्सव, धार्मिक अनुष्ठान और श्रम – से जुड़े हुए हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास के वाहक भी हैं।
लोकगीतों के विकास क्रम में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि समय और परिस्थितियों के अनुसार इनमें बदलाव आया, परंतु उनकी मूल आत्मा वही रही। ग्राम्य जीवन की सरलता, लोकमानस की भावनाएँ और सामूहिक चेतना आज भी इन गीतों में जीवित है। परंपरागत स्वरूप की दृष्टि से हिंदी लोकगीतों की भाषा सहज, लयात्मक और बोली-आधारित होती है, जो जनमानस के बीच तुरंत अपनापन पैदा करती है। हालाँकि आधुनिकता और वैश्वीकरण के प्रभाव से लोकगीतों की परंपरा धीरे-धीरे कमजोर हो रही है, पर संरक्षण के प्रयास इनकी जीवंतता बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं। लोकगीत न केवल सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों और परंपराओं को जीवित रखने वाले अमूल्य साधन भी हैं।
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