असंगठित क्षेत्र में बाल श्रम के निर्धारक एवं प्रभाव: भारत के संदर्भ में एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Keywords:
बाल श्रम, असंगठित क्षेत्र, गरीबी, अभिभावकीय शिक्षा, प्रवासन, ची-वर्ग परीक्षण, प्रतिगमन, भारत।Abstract
बाल श्रम भारत की एक जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्या है, जो विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र में व्यापक रूप से विद्यमान है। प्रस्तुत अध्ययन असंगठित क्षेत्र में बाल श्रम के निर्धारकों एवं इसके प्रभावों का सैद्धांतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन विभिन्न समाजशास्त्रीय एवं आर्थिक सिद्धांतों, जैसे गरीबी सिद्धांत, मानव पूंजी सिद्धांत, सामाजिक बहिष्करण सिद्धांत तथा संरचनात्मक-कार्यात्मक दृष्टिकोण के आधार पर बाल श्रम की समस्या को समझने का प्रयास करता है। सैद्धांतिक दृष्टि से यह माना जाता है कि पारिवारिक गरीबी, निम्न आय स्तर, अभिभावकों की अशिक्षा, बेरोजगारी, ग्रामीण-शहरी प्रवासन तथा सामाजिक असुरक्षा जैसे कारक बच्चों को श्रम बाजार में प्रवेश करने के लिए विवश करते हैं। असंगठित क्षेत्र में श्रम की सस्ती उपलब्धता तथा कमजोर नियामक व्यवस्था भी बाल श्रम को बढ़ावा देती है। अध्ययन यह दर्शाता है कि बाल श्रम बच्चों के शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक एवं सामाजिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। बाल श्रमिक प्रायः शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, जिससे उनके कौशल विकास एवं भविष्य के रोजगार अवसर सीमित हो जाते हैं। साथ ही, असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ उनके स्वास्थ्य एवं मनोवैज्ञानिक कल्याण को प्रभावित करती हैं। मानव पूंजी सिद्धांत के अनुसार बाल श्रम दीर्घकाल में गरीबी के चक्र को बनाए रखता है। अध्ययन निष्कर्षतः यह प्रतिपादित करता है कि बाल श्रम उन्मूलन के लिए गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा तथा प्रभावी श्रम कानूनों के समन्वित क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
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