मध्यकालीन हरियाणा में पारंपरिक जल प्रबंधन एवं पर्यावरणीय विरासत: ज्ञानी चोर की गुफा का ऐतिहासिक अध्ययन

Authors

  • रेनू
  • डॉ. नीलम रानी
  • प्रो. विष्णु भगवान

Keywords:

ज्ञानी चोर की बावड़ी, महम, मुगलकालीन स्थापत्य, जल-संरक्षण, बावड़ी, हरियाणा, पर्यावरणीय इतिहास, लोककथा, फारसी अभिलेख, सांस्कृतिक धरोहर।

Abstract

हरियाणा के रोहतक जनपद के महम नगर में स्थित ‘ज्ञानी चोर की बावड़ी’ मुगलकालीन स्थापत्य एवं पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणाली का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। 17वीं शताब्दी में शाहजहाँ काल के दौरान निर्मित यह बावड़ी अपनी 101 सीढ़ियों, बहु-स्तरीय संरचना, फारसी अभिलेख तथा स्थानीय लोककथाओं के कारण विशेष ऐतिहासिक महत्व रखती है। प्रस्तुत शोध-पत्र में बावड़ी के इतिहास, स्थापत्य, पर्यावरणीय महत्व तथा लोक-सांस्कृतिक पक्षों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह बावड़ी केवल जल-स्रोत नहीं थी, बल्कि यात्रियों, व्यापारियों तथा स्थानीय समाज के सामाजिक जीवन का भी केंद्र थी।

References

Rohtak District Gazetteer (1910), 43.

Subhash Parihar, “Baolis of Punjab and Haryana,” Marg 51, no. 1 (Mumbai, 1999): 73.

पीटर मुंडी, Pen & Pencil Sketches, Vol. I (London: John Murray, 1832), 354.

Subhash Parihar, “Baolis of Punjab and Haryana,” 73.

Ibid.

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How to Cite

रेनू, डॉ. नीलम रानी, & प्रो. विष्णु भगवान. (2026). मध्यकालीन हरियाणा में पारंपरिक जल प्रबंधन एवं पर्यावरणीय विरासत: ज्ञानी चोर की गुफा का ऐतिहासिक अध्ययन. Kavya Setu, 2(6), 72–81. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/303

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