हृषीकेश सुलभ के ‘धरती आबा’ नाटक में आदिवासी अस्मिता और बिरसा मुंडा का जननायकत्व

Authors

  • प्रा. डॉ. अभयकुमार रमेश खैरनार, अनिलकुमार मुरलीधर सोनवणे

Keywords:

हृषीकेश सुलभ, धरती आबा, बिरसा मुंडा, इतिहास-बोध, आदिवासी अस्मिता, औपनिवेशिक शोषण, जल-जंगल-जमीन, सांस्कृतिक चेतना, प्रतिरोध और जननायकत्व।

Abstract

समकालीन हिंदी नाट्य-साहित्य में हृषीकेश सुलभ का धरती आबा एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक और आदिवासी चेतना से संपन्न नाटक है। इसमें नाटककार ने आदिवासी जननायक बिरसा मुंडा के जीवन-संघर्ष, सामाजिक सुधार, सांस्कृतिक जागरण और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध किए गए विद्रोह का प्रभावशाली चित्रण किया है। नाटक केवल बिरसा के जीवन की ऐतिहासिक घटनाओं का पुनर्पाठ नहीं करता, बल्कि औपनिवेशिक शासन, जमींदारी व्यवस्था, महाजनी शोषण, धार्मिक हस्तक्षेप और आदिवासी विस्थापन के कारणों की भी पड़ताल करता है। बिरसा मुंडा आदिवासी समाज को अंधविश्वास, भय, अशिक्षा और बिखराव से मुक्त करके संगठन, संघर्ष और आत्मसम्मान का मार्ग दिखाते हैं। नाटक में लोकगीत, प्रतीक, संवाद, पूर्वदीप्ति और जनजातीय सांस्कृतिक तत्त्वों के माध्यम से बिरसा को केवल मुंडा समुदाय के नायक के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय मुक्ति, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया है।

References

सुलभ, हृषीकेश. धरती आबा. तृतीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., 2019, पृ. 17–18

वही, पृ. 23

वही, पृ. 26

वही, पृ. 35

वही, पृ. 46

वही, पृ. 87

वही, पृ. 96

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How to Cite

प्रा. डॉ. अभयकुमार रमेश खैरनार, अनिलकुमार मुरलीधर सोनवणे. (2026). हृषीकेश सुलभ के ‘धरती आबा’ नाटक में आदिवासी अस्मिता और बिरसा मुंडा का जननायकत्व. Kavya Setu, 2(3), 260–266. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/320

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