गाँधीजी के श्रम व पूँजी संबंधित विचारों का विश्लेषणात्मक अध्ययन
Keywords:
रेखांकित, स्थानीय उत्पादन, वास्तव, सामाजिक आवश्यकताओं, उपभोक्ताओं, ईशावास्योपनिषद्Abstract
गाँधीजी ने श्रम एवं पूँजी के संबंध से एक नवीन दृष्टिकोण को प्रतिपादन किया। गाँधीजी ने स्पष्ट किया कि श्रम व पूँजी के मध्य कोई नैसर्गिक टकराव नहीं है। उनका स्पष्ट मत था कि उत्पादक की प्रक्रिया में श्रम की निर्णायक महत्ता को स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि वस्तुतः श्रम ही पूँजी को सार्थक बनाता है। गाँधीजी ने कहा कि मेरे मत मे ंतो श्रम ही सच्ची पूँजी है। श्रम ऐसी मुद्रा है जिसे सार्वभौम रूप से चलाया जा सकता है।
उन्होंने कहा- मेरी कल्पना के ग्राम में ग्रामीण व्यक्ति जड़ नहीं होगा-शुद्ध चैतन्य होगा। वह गन्दगी में, अँधेरे कमरे में, पशुवत् जीवन-यापन नहीं करेगा, स्त्री-पुरुष स्वतंत्रता से रहेंगें वहाँ रोग नहीं होगा। न कोई अभाव में जिएगा और न ऐसे आराम में रहेगा। सबको शारीरिक मेहनत करनी होगी।
गाँधीजी ने एक ऐसी आदर्श ग्रामीण भारतीय अर्थव्यवस्था की कल्पना की जिसके मूल मंत्र होंगे- आत्मनिर्भरता और विकेन्द्रीकरण। इस उत्पादन प्रणाली में पूँजी की तुलना में श्रम की प्रतिष्ठा होगी अतः उत्पादक शोषण को जन्म नहीं देगा। गाँधीजी ने स्पष्ट किया कि लघु व कुटीर उद्योगों पर आधारित अर्थव्यवस्था से उत्पादन मुख्यतः स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए होगा। अतः स्थानीय उत्पादन, स्थानीय उपभोग औरर विवेकसम्मत वितरण, अर्थव्यवस्था के निर्देशक सूत्र होंगे।
References
यंग इंडिया, 8 जनवरी, 1925
हरिजन, 16 मार्च, 1947
बन्च आॅफ ओल्ड लेटर्स, 1958, पृ. 506-7
प्रो. चतुर्वेदी, मधुकर श्याम, प्रमुख भारतीय राजनीतिक विचारक, 1991, पृ. 338
हरिजन, 7 सितम्बर, 1947
हरिजन, 3 जून, 1934
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