जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांतः वर्तमान सामाजिक संदर्भ में प्रासंगिकता
Keywords:
जैन धर्म, अहिंसा सिद्धांत, सामाजिक प्रासंगिकता, शांति और सहिष्णुता, पर्यावरणीय संतुलनAbstract
जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांत न केवल धार्मिक आस्थाओं का हिस्सा है, बल्कि यह समाज में शांति, समरसता और पर्यावरणीय संतुलन की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अहिंसा का पालन केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक हिंसा से भी बचने की बात करता है। वर्तमान सामाजिक संदर्भ में, जहाँ युद्ध, हिंसा, पर्यावरणीय संकट और असमानताएँ व्याप्त हैं, जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांत अत्यधिक प्रासंगिक हो गया है। यह सिद्धांत आज के समाज में शांति, सहिष्णुता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसके अलावा, यह पर्यावरणीय संकटों को हल करने में भी मदद कर सकता है, क्योंकि अहिंसा हमें प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन करने से बचने की प्रेरणा देती है। इस प्रकार, जैन अहिंसा सिद्धांत का पालन समाज के लिए आवश्यक है।
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