कृष्ण-काव्य के शृंगार एवं भक्ति-भाव का कथक नृत्य में भावाभिनय और रस-निष्पत्ति के माध्यम से प्रकटीकरण।
DOI:
https://doi.org/10.65578/kavyasetu.v2.i11.411Keywords:
कृष्ण-काव्य, कथक, शृंगार रस, भक्ति-भाव, भावाभिनय, रस-निष्पत्ति, राधा-कृष्ण, संयोग शृंगार, विप्रलम्भ शृंगार, सहृदयता।Abstract
भारतीय शास्त्रीय कलाओं में साहित्य, संगीत, देहगत अभिव्यक्ति और आध्यात्मिक अनुभूति का परस्पर सम्बन्ध विशिष्ट सौन्दर्यात्मक अनुभव का निर्माण करता है। कृष्ण-काव्य और कथक नृत्य का अन्तर्सम्बन्ध इसी समन्वय का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। सूरदास, जयदेव, मीराबाई और रसखान जैसे कवियों की रचनाओं में अनुराग, मान, संयोग, विप्रलम्भ, प्रतीक्षा, स्मृति, आत्मनिवेदन तथा आराध्य के प्रति समर्पण जैसी भावात्मक अवस्थाएँ विविध रूपों में व्यक्त हुई हैं। कथक की अभिनयपरक परम्परा इन काव्यगत संवेदनाओं को दृष्टि-विन्यास, मुखाभिनय, हस्तमुद्रा, देह-स्थिति, गतिभेद, लय और संगीत के माध्यम से दृश्य तथा अनुभूति-प्रधान रूप प्रदान कर सकती है। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य कृष्ण-काव्य में शृंगार और भक्ति-भाव की संरचना का विश्लेषण करना तथा कथक में उनके नृत्यात्मक प्रकटीकरण को भरतमुनि के रस-सिद्धान्त और अभिनवगुप्त की रसास्वादन-सम्बन्धी व्याख्या के आलोक में समझना है। अध्ययन वर्णनात्मक, पाठ-आधारित, विश्लेषणात्मक और सैद्धान्तिक पद्धति पर आधारित है। इसमें संयोग और विप्रलम्भ शृंगार, चार प्रकार के अभिनय, विभाव-अनुभाव-संचारी भावों के समन्वय तथा दर्शक की सहृदयता की भूमिका का विवेचन किया गया है। अध्ययन का प्रमुख निष्कर्ष है कि कथक में भावाभिनय की प्रभावकारिता केवल मुद्राओं की संख्या या बाह्य प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करती; वह काव्य-पाठ की समझ, भावों के क्रमिक विकास, संगीत-लय के अनुकूलन और प्रस्तुति की आन्तरिक संगति से निर्मित होती है। साथ ही, शृंगार-रस और भक्ति-भाव के सम्बन्ध को स्वीकार करते हुए दोनों की सैद्धान्तिक तथा ऐतिहासिक विशिष्टताओं को पृथक् पहचानना आवश्यक है।
References
बियरनैकी, एल. (2011)। अभिनवगुप्त की रस-अवधारणा के माध्यम से तांत्रिक अद्वैतवादी नैतिकता की ओर। हिंदू अध्ययन पत्रिका, 4(3), 258–273।
भार्गव, टी. (2025)। आभा अथवा रस? दैनिक जीवन के सौंदर्यशास्त्र की अंतर-सांस्कृतिक अवधारणा की ओर। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद की शोध-पत्रिका, 43(2), 155–172।
डेविड, एच. (2016)। समय, क्रिया और आख्यान: अभिनवगुप्त के सौंदर्यशास्त्रीय सिद्धान्त के कुछ व्याख्यात्मक स्रोतों का अध्ययन। भारतीय दर्शन पत्रिका, 44(1), 125–154।
हरमलकर, एस., एवं शर्मा, ए. (2026)। भारत की मंदिर-परंपरा के रूप में कथक नृत्य का विकास। ग्रंथालय शोध पत्रिका, 14(2), 69–73।
खानम, बी., एवं दरख्शा। (2024)। रस: भारतीय सौंदर्यशास्त्रीय सिद्धान्त का एक अवलोकन। सृजनात्मक शोध-विचार पत्रिका, 12(3), एल216–एल224।
लल्ली, जी. (2004)। उत्तर भारतीय शास्त्रीय नृत्य का एक रूप: लखनऊ घराने का कथक। दृश्य मानवविज्ञान, 17(1), 19–43।
ओकिता, के. (2017)। रस से भक्तिरस तक: आरंभिक आधुनिक दक्षिण एशिया में भक्तिपरक सौंदर्यशास्त्रीय सिद्धान्त का विकास। भारतीय एवं बौद्ध अध्ययन पत्रिका, 65(3), 1066–1072।
रैना, ए. (2019)। कथकली अभिनेता के सौंदर्यानुभव के रूप में रस की पुनर्व्याख्या। रंगमंच, नृत्य एवं प्रदर्शन-प्रशिक्षण, 10(1), 113–126।
सिंह, एस. (2024)। भरतमुनि के सौंदर्यशास्त्रीय रस-सिद्धान्त के साहित्यिक आयाम। पूर्व-पश्चिम चिंतन पत्रिका, 14(4)।
तमोशायटी, डी. (2000)। भारतीय शास्त्रीय संगीत के सौंदर्यशास्त्र में रस की अवधारणा। विल्नियस प्राच्य अध्ययन पत्रिका, 1, 183–200।
Downloads
How to Cite
Issue
Section
License
Copyright (c) 2026 Kavya Setu

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.