ईशोपनिषद् : एक दार्शनिक विश्लेषण

Authors

  • डॉ. सुमन

Keywords:

ईशोपनिषद्, ब्रह्मविद्या, विद्या–अविद्या, अद्वैत, निष्काम कर्म, साधना, मोक्ष, मृत्यु-दर्शन, ब्रह्म–ऐक्य भाव

Abstract

ईशोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का 40वाँ अध्याय है और यह संक्षिप्त रूप मे समग्र वेदांत-दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। यह शोध-पत्र ईशोपनिषद् के 18 मंत्रों में निहित ब्रह्मविद्या के स्वरूप, सिद्धांत, साधन तथा फल का दार्शनिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। मानव जीवन को जन्म और मृत्यु के मध्य स्थित एक चक्रवत् यात्रा मानते हुए, यह अध्ययन दिखाता है कि जीवन का रहस्य केवल बाह्य जगत की खोज से नहीं, बल्कि अंतर्मुखता और आत्म-मीमांसा के माध्यम से ही प्रकट हो सकता है।

ईशोपनिषद् के प्रथम तीन मंत्रों में व्यक्त ब्रह्मविद्या का स्वरूप त्याग और उपभोग के समन्वय, ईश्वर की सर्वव्यापकता तथा निष्काम कर्म के सिद्धांत के रूप में उभरता है। आगे के मंत्रों (4-8) में आत्मा की अजर-अमर, अविनाशी एवं सर्वव्यापी सत्ता तथा योगी की ब्रह्म-दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। तृतीय खंड (9-14) में विद्या (आत्मज्ञान) और अविद्या (कर्म/उपासना) के संतुलन की अनिवार्यता को स्थापित किया गया है। अंतिम खंड (15-18) मृत्यु के रहस्य, माया के स्वर्णमय आवरण, ब्रह्म–ऐक्य-भाव तथा अमृतत्व की प्राप्ति का दार्शनिक विवेचन करता है।

अध्ययन से निष्कर्ष रूप में प्रतिपादित होता है कि ईशोपनिषद् केवल सैद्धांतिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संतुलित, वैज्ञानिक एवं साधनामय पद्धति प्रस्तुत करता है, जहाँ ज्ञान और कर्म का समन्वय, निष्काम भाव, इंद्रियनिग्रह तथा प्राण-साधना के माध्यम से मनुष्य मृत्यु-भय से परे अमृतत्व और निर्भयता की अनुभूति तक पहुँच सकता है।

References

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Published

05-01-2026

How to Cite

डॉ. सुमन. (2026). ईशोपनिषद् : एक दार्शनिक विश्लेषण. Kavya Setu, 2(1), 1–9. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/120

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Original Research Articles