भारत में सूचना का अधिकार और सुशासन: पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सशक्तीकरण का संस्थागत विश्लेषण
DOI:
https://doi.org/10.65578/kavyasetu.v2.i2.178Keywords:
सूचना का अधिकार, सुशासन, पारदर्शिता, जवाबदेही, नागरिक सशक्तिकरण, सूचना आयोग।Abstract
सूचना का अधिकार (RTI) आधुनिक लोकतांत्रिक शासन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नागरिक सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण उपकरण है। भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक खुला, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संस्थागत सुधार के रूप में उभरा है। यह अध्ययन सूचना के अधिकार की संवैधानिक एवं वैधानिक पृष्ठभूमि, उसकी वैचारिक आवश्यकता तथा सुशासन के संदर्भ में उसकी भूमिका का विश्लेषण करता है। अध्ययन में सूचना के अधिकार की अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि, भारत में इसके विकास की ऐतिहासिक यात्रा तथा अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों और संस्थागत संरचना का विस्तृत परीक्षण किया गया है। अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य यह समझना है कि सूचना का अधिकार किस प्रकार पारदर्शिता को बढ़ाता है, प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करता है, नागरिकों को शासन की निगरानी में सक्षम बनाता है तथा भ्रष्टाचार नियंत्रण में सहायक सिद्ध होता है। साथ ही, सूचना आयोगों की कार्यप्रणाली, दंडात्मक प्रावधानों और स्वप्रकाशन की व्यवस्था के माध्यम से अधिनियम की व्यावहारिक प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया है। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के समक्ष अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं, जैसे सूचना प्रदान करने में विलंब, आयोगों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या, संस्थागत संसाधनों की कमी, प्रशासनिक प्रतिरोध, नागरिक जागरूकता का अभाव तथा कुछ मामलों में इसके दुरुपयोग की प्रवृत्ति। अतः, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारतीय लोकतंत्र में सुशासन की स्थापना की दिशा में एक परिवर्तनकारी पहल है। इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए सूचना आयोगों को सुदृढ़ करना, डिजिटल पारदर्शिता को बढ़ावा देना, प्रशासनिक क्षमता निर्माण करना तथा नागरिकों के बीच व्यापक जागरूकता सुनिश्चित करना आवश्यक है। यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि सूचना का अधिकार लोकतांत्रिक वैधता, जनभागीदारी और पारदर्शी शासन को सुदृढ़ करने में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
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