लोकतंत्र के आध्यात्मिक एवं नैतिक आधार: भारतीय और पाश्चात्य चिंतन-परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन

Authors

  • पारस सिंगला, डॉ. राजदीप कौर

Keywords:

लोकतंत्र, आध्यात्मिकता, नैतिकता, स्वराज, बंधुत्व, नागरिक सद्गुण, सार्वजनिक विवेक, तुलनात्मक राजनीतिक चिंतन।

Abstract

लोकतंत्र को सामान्यतः चुनाव, प्रतिनिधित्व, बहुमत, विधि-शासन और संस्थागत उत्तरदायित्व से जोड़कर समझा जाता है, किंतु उसकी स्थिरता केवल प्रक्रियात्मक व्यवस्थाओं से सुनिश्चित नहीं होती। लोकतांत्रिक जीवन के लिए व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्र विवेक, समान नैतिक मूल्य, बंधुत्व, संवाद, अहिंसा, सहिष्णुता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व जैसी मान्यताएँ आवश्यक हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी व्यापक अर्थ में लोकतंत्र के आध्यात्मिक एवं नैतिक आधारों का भारतीय और पाश्चात्य चिंतन-परंपराओं के संदर्भ में तुलनात्मक अध्ययन करता है। यहाँ ‘आध्यात्मिक’ का अर्थ किसी एक धर्म-संप्रदाय का राजनीतिक प्रभुत्व नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्निहित मूल्य, आत्मसंयम, परस्पर संबद्धता, सत्य की खोज और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकमंगल के प्रति प्रतिबद्धता है। भारतीय परंपरा में उपनिषदों की आत्म-एकता, बौद्ध करुणा और परस्पर-निर्भरता, जैन अनेकांतवाद, विवेकानंद की व्यावहारिक वेदांत-दृष्टि, गांधी का सत्य-अहिंसा और स्वराज, टैगोर का विश्वमानववाद, श्री अरविंद का आध्यात्मिक उत्क्रांतिवाद तथा आंबेडकर का स्वतंत्रता-समानता-बंधुत्व आधारित सामाजिक लोकतंत्र अध्ययन के प्रमुख आधार हैं। पाश्चात्य परंपरा में यूनानी नागरिक सद्गुण, लॉक के प्राकृतिक अधिकार, रूसो की सामान्य इच्छा, मिल की स्वतंत्रता, टॉकविल की नागरिक सहभागिता, ड्यूई का लोकतंत्र को सहजीवन की पद्धति मानना, रॉल्स का न्याय तथा हैबरमास का संवादात्मक विवेक केंद्रीय संदर्भ हैं। अध्ययन व्याख्यात्मक, तुलनात्मक और आलोचनात्मक पद्धति पर आधारित है। निष्कर्षतः दोनों परंपराएँ इस बात पर सहमत दिखाई देती हैं कि लोकतंत्र एक नैतिक संस्कृति के बिना खोखला हो सकता है। भारतीय दृष्टि आत्मानुशासन, करुणा, अहिंसा और सामाजिक बंधुत्व पर विशेष बल देती है, जबकि पाश्चात्य आधुनिकता अधिकारों, संस्थाओं, सार्वजनिक तर्क और वैधानिक समानता को विकसित करती है। समकालीन लोकतंत्र के लिए इन दोनों की रचनात्मक संगति—आंतरिक नैतिक रूपांतरण तथा बाह्य संस्थागत नियंत्रण—अधिक उपयुक्त आधार प्रस्तुत करती है।

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How to Cite

पारस सिंगला, डॉ. राजदीप कौर. (2026). लोकतंत्र के आध्यात्मिक एवं नैतिक आधार: भारतीय और पाश्चात्य चिंतन-परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन. Kavya Setu, 2(7), 103–115. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/325

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