नवदोत्तरी हिंदी उपन्यासों में नारी चिंतन के विविध आयाम: एक अनुशीलन
Keywords:
नारी चिंतन, नवदोत्तरी हिंदी उपन्यास, स्त्री-विमर्श, नारीवाद, पितृसत्ता, आत्मनिर्णय, स्त्री-अस्मिता।Abstract
प्रस्तुत शोध आलेख नवदोत्तरी हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त नारी चिंतन के विविध आयामों का अनुशीलन प्रस्तुत करता है। स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में आधुनिक शिक्षा, नगरीकरण, औद्योगीकरण तथा लोकतांत्रिक चेतना के प्रभाव से स्त्री की सामाजिक स्थिति और साहित्यिक छवि में व्यापक परिवर्तन आया। इस दौर के उपन्यासों में स्त्री केवल त्याग, ममता और सहनशीलता की पारम्परिक प्रतिमा तक सीमित न रहकर स्वतंत्र व्यक्तित्व, अस्मिता, आत्मनिर्णय और अधिकार-बोध से युक्त चेतनशील इकाई के रूप में उभरती है। प्रभा खेतान का छिन्नमस्ता, मृदुला गर्ग का कठगुलाब, मैत्रेयी पुष्पा का चाक, चित्रा मुद्गल का आवाँ तथा ममता कालिया का एक पत्नी के नोट्स जैसी कृतियाँ स्त्री-देह, श्रम, प्रेम, यौनिकता, मातृत्व, आर्थिक स्वावलम्बन और सामाजिक प्रतिरोध के प्रश्नों को नारी चिंतन के केन्द्र में स्थापित करती हैं। यह आलेख भारतीय एवं पाश्चात्य नारीवादी दृष्टियों के आलोक में इन कृतियों का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट करता है कि नवदोत्तरी हिंदी उपन्यास स्त्री की 'स्थिति' के वर्णन से आगे बढ़कर उसकी 'चेतना' के विश्लेषण की ओर संक्रमण को दर्शाता है (शर्मा, 2019)। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह साहित्य स्त्री-अस्मिता, आत्मसंघर्ष और सामाजिक परिवर्तन की चेतना को सशक्त बनाने का महत्त्वपूर्ण सृजनात्मक माध्यम है।
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