भारतीय संस्कृति में नारी की परंपरागत भूमिका और 21वीं सदी में उसका परिवर्तन

Authors

  • शशि प्रभा सिंह चैहान, डाॅ॰ अनीता राठी

Keywords:

भारतीय संस्कृति, नारी की परंपरागत भूमिका, स्वतंत्रता संग्राम, संवैधानिक अधिकार, 21वीं सदी, नारी सशक्तिकरण, पितृसत्ता और चुनौतियाँ, परंपरा और आधुनिकता।

Abstract

भारतीय संस्कृति में नारी का स्थान अत्यंत सम्माननीय और विशिष्ट रहा है। वैदिक काल में स्त्रियाँ विदुषी, ऋषिकाएँ और सामाजिक जीवन की सक्रिय सहभागी थीं। परंतु समय के साथ-साथ पितृसत्तात्मक व्यवस्था और सामाजिक रूढ़ियों ने उनके अधिकारों को सीमित किया, जिसके परिणामस्वरूप नारी की भूमिका गृहिणी और पारिवारिक दायरे तक सिमटकर रह गई। मध्यकालीन भारत में पर्दा प्रथा, सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं ने नारी की स्वतंत्रता को और बाधित किया। किन्तु 19वीं और 20वीं शताब्दी में हुए सामाजिक सुधार आंदोलनों तथा स्वतंत्रता संग्राम में महिला सहभागिता ने एक नए जागरण की नींव रखी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय संविधान ने स्त्रियों को समानता, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक अधिकार प्रदान किए। विभिन्न कानूनी प्रावधानों और आरक्षण नीतियों ने महिलाओं को सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य में नई पहचान दी। विशेषतः 21वीं सदी में नारी की भूमिका में व्यापक परिवर्तन देखा गया है। महिलाएँ अब शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, राजनीति और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। डिजिटल युग ने उन्हें आत्म-अभिव्यक्ति और आर्थिक स्वतंत्रता के नए अवसर प्रदान किए हैं।
फिर भी नारी सशक्तिकरण की राह में अनेक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शिक्षा तथा अवसरों की असमानता, लैंगिक भेदभाव, घरेलू हिंसा और कार्यस्थल पर उत्पीड़न आज भी महत्वपूर्ण अवरोध बने हुए हैं। इसके बावजूद, 21वीं सदी की भारतीय नारी परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित कर रही है।

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Published

08-10-2025

How to Cite

शशि प्रभा सिंह चैहान, डाॅ॰ अनीता राठी. (2025). भारतीय संस्कृति में नारी की परंपरागत भूमिका और 21वीं सदी में उसका परिवर्तन. Kavya Setu, 1(10), 34–42. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/89

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