भारतीय लोकतंत्र में चुनाव सुधार और ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’: व्यावहारिकता और चुनौतियाँ

Authors

  • हरीश कुमार, डाॅ॰ जयवीर सिंह

Keywords:

भारतीय लोकतंत्र, चुनाव सुधार, एक राष्ट्र-एक चुनाव, संवैधानिक परिप्रेक्ष्य, संघीय ढाँचा, चुनावी आचार संहिता, चुनाव प्रबंधन, लोकतांत्रिक स्थिरता, राजनीतिक चुनौतियाँ, व्यावहारिक कठिनाइयाँ।

Abstract

भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और सबसे विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक ढाँचा है, जिसकी सफलता का मूल आधार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया मानी जाती है। परंतु बार-बार होने वाले चुनावों ने पिछले कुछ दशकों में इस प्रणाली के सामने कई व्यावहारिक और संरचनात्मक चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं। चुनावी आचार संहिता का बार-बार लागू होना विकास कार्यों की गति को प्रभावित करता है, वहीं अत्यधिक वित्तीय व्यय और प्रशासनिक संसाधनों का दोहराव शासन व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालता है। इसी संदर्भ में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ की अवधारणा एक महत्त्वपूर्ण चुनाव सुधार के रूप में उभरकर सामने आई है।
यह शोधपत्र इस अवधारणा का सैद्धांतिक, संवैधानिक तथा व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में पाया गया है कि एक साथ चुनाव होने से वित्तीय संसाधनों की बचत, शासन की स्थिरता और मतदाताओं की सुविधा जैसे अनेक लाभ संभव हैं। परंतु दूसरी ओर संघीय ढाँचे पर दबाव, राज्यों की स्वायत्तता में कमी और असमय सरकार गिरने की स्थिति में संवैधानिक संकट जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त चुनाव प्रबंधन की व्यावहारिक कठिनाइयाँ, जैसे ईवीएम और वीवीपैट की विशाल संख्या की आवश्यकता, सुरक्षा बलों का समन्वय तथा मानव संसाधन की उपलब्धता, इस अवधारणा की व्यावहारिकता को जटिल बनाती हैं।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव दर्शाते हैं कि कुछ देशों में एक साथ चुनाव सफलतापूर्वक आयोजित हुए हैं, किंतु भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण संघीय लोकतंत्र में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत कठिन है। इसलिए यह शोधपत्र सुझाव देता है कि भारत में चुनाव सुधारों को चरणबद्ध और लचीले मॉडल के रूप में अपनाया जाए, जैसे कि दो चरणीय चुनाव प्रणाली अथवा संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से कार्यकाल का आंशिक सामंजस्य।

References

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Published

08-10-2025

How to Cite

हरीश कुमार, डाॅ॰ जयवीर सिंह. (2025). भारतीय लोकतंत्र में चुनाव सुधार और ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’: व्यावहारिकता और चुनौतियाँ. Kavya Setu, 1(10), 55–66. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/91

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