शिवप्रसाद कृत ‘शैलूष’ उपन्यास में नट जनजाति की सभ्यता एवं संस्कृति
Keywords:
भारतीय संस्कृति, नट जनजाति, जीवन मूल्य, सभ्यता एवं संस्कृतिAbstract
भारतीय समाज संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से विविधता को धारण किया हुआ है और इस विविधता के दर्शन में एकता के कई मूल्य निहित है। भारतीय समाज की विविधता विभिन्न धर्म, वर्ण, वर्ग, सम्प्रदाय, पन्थ और जातियों के अपने संस्कारों और नैतिक-अनैतिक मूल्यों के आधारों पर निर्मित हुई है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में विभिन्न सामाजिक वर्गों की अनेक कोटियां विद्यमान हैं। इसी का एक हिस्सा जनजातीय समूहों का है, जिनका हमारे समाज में ऐतिहासिक दृष्टि से एक व्यापक समाज-सांस्कृतिक परिदृश्य है। प्राचीन युग से लेकर आज तक के विज्ञान युग में जनजातीय समुदायों का देश के अलग-अलग क्षेत्र, भूप्रदेश, जंगल, पहाड़ तथा दूरदराज के इलाकों में बसेरा रहा हैं। जिस जनजाति का जहाँ निवास रहा है, वहाँ पर उस जनजाति की अपनी विशिष्ट संस्कृति और सभ्यता विकसित होती रही है। प्रायः आज भी भारतीय समाज की जनजातियों में ऐतिहासिक तथ्यों, जीवन मूल्यों-सन्दर्भों एवं आचार-विचारों आदि में विभिन्नता दिखाई देती है। देश की सभी जनजातियाँ विभिन्नता के दर्शन की परिचायक रही हैं। यद्यपि प्रत्येक जनजाति अपनी-अपनी अलग पहचान रखते हुए भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। प्रस्तुत आलेख में शिवप्रसाद कृत ‘शैलूष’ उपन्यास में नट जनजाति की सभ्यता एवं संस्कृति को दिखाया गया है।
References
शिवप्रसाद सिंह, शैलूष, भूमिका, पृ. XV
सत्यदेव त्रिमूर्ति, शिवप्रसाद सिंह का परावर्तक कथा साहित्य, पृ0 139
शिवप्रसाद सिंह, शैलूष, पृ. 258
वही, पृ. 149, 150
वही, पृ. 160
सत्यदेव त्रिमूर्ति, शिवप्रसाद सिंह का परावर्तक कथा साहित्य, पृ. 143
शिवप्रसाद सिंह, शैलूष, पृ. 178
वही, पृ. 177
वही, पृ. 179
वही, पृ 243
Downloads
Published
How to Cite
Issue
Section
License
Copyright (c) 2026 Kavya Setu

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.