उत्तर भारत में सिंचाई प्रौद्योगिकी का विकास और कृषि पर उसका प्रभाव

Authors

  • सविता
  • डॉ. अर्जुन सिंह

Keywords:

सिंचाई प्रौद्योगिकी, उत्तर भारत, कृषि, कूप, वापी, तड़ाग, अरघट्ट, जल-प्रबंधन, कश्मीर, प्रारंभिक मध्यकाल

Abstract

उत्तर भारत की कृषि व्यवस्था का विकास प्राकृतिक जल-स्रोतों, मानसूनी वर्षा तथा मानव द्वारा निर्मित सिंचाई साधनों के परस्पर संबंध के आधार पर हुआ। प्रारंभिक काल से ही कृषि उत्पादन मुख्यतः वर्षा पर निर्भर था, परन्तु मानसून की अनिश्चितता, वर्षा के असमान वितरण तथा विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों ने कृषकों को वैकल्पिक जल-स्रोतों और सिंचाई तकनीकों के विकास के लिए प्रेरित किया। कुएँ, तालाब, वापी, तड़ाग, बाँध, जलाशय, छोटी नहरें, जल-निकास प्रणालियाँ तथा जल-उत्थापक यंत्र इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण परिणाम थे। मौर्यकाल में सिंचाई व्यवस्था को राज्य की कृषि नीति और राजस्व प्रणाली से जोड़कर देखा गया, जिससे जल-संसाधनों के नियोजन और उपयोग का संस्थागत स्वरूप विकसित हुआ। गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में कृषि क्षेत्र के विस्तार के साथ स्थानीय सिंचाई साधनों की उपयोगिता बढ़ी तथा जल-उत्थापक यंत्रों के प्रयोग से कृषि उत्पादन को अधिक नियमित बनाने का प्रयास किया गया। प्रारंभिक मध्यकाल में कूप, वापी, तड़ाग और अरघट्ट जैसी तकनीकों का प्रयोग अधिक व्यापक रूप में दिखाई देता है। कश्मीर में ललितादित्य तथा अवन्तिवर्मन के शासनकाल में किए गए जल-प्रबंधन कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सुय्य द्वारा वितस्ता नदी के प्रवाह का नियमन, बाढ़ नियंत्रण, जलमग्न भूमि की निकासी तथा सिंचाई नहरों का विकास कृषि योग्य भूमि के विस्तार में सहायक सिद्ध हुआ। प्रस्तुत शोध-पत्र में प्रारंभिक काल से बारहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत में सिंचाई प्रौद्योगिकी के क्रमिक विकास तथा कृषि उत्पादन, फसल विविधता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि अधिशेष और राज्य के राजस्व पर उसके व्यापक प्रभावों का ऐतिहासिक विश्लेषण किया गया है।

References

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How to Cite

सविता, & डॉ. अर्जुन सिंह. (2026). उत्तर भारत में सिंचाई प्रौद्योगिकी का विकास और कृषि पर उसका प्रभाव. Kavya Setu, 2(8), 21–30. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/348

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