नारीवाद के परिपेक्ष मे महिला आंदोलन का वर्तमान दृष्टिकोण
DOI:
https://doi.org/10.65578/kavyasetu.v2.i8.345Keywords:
नारीवाद , महिला आन्दोलन , लैंगिक समानता , महिला सशक्तिकरण , पितृसत्ता , महिला अधिकारAbstract
नारीवाद एक प्रगतिशील विचारधारा एवं आंदोलन है, इसका प्रमुख प्रयोजन महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार, सामाजिक सम्मान एवं सहभागिता प्राप्त कराना तथा पितृसत्तात्मक संरचना को प्रश्नांकित करना है। इस विचार का आरंभ पश्चिमी जगत में उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी में मुख्यतः मतदान, शिक्षा तथा रोजगार के अधिकार जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के साथ हुआ तथा कालांतर में विभिन्न राष्ट्रों की सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना एवं महिलाओं की स्थिति के आधार पर विकसित हुआ। महिलाओं की दयनीय स्थिति के कारणों एवं समाधान को विभिन्न धाराओं द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसमें प्रमुख रूप से तीन धाराएँ- उदारवादी नारीवाद, मूल परिवर्तनवादी नारीवाद तथा समाजवादी नारीवाद सम्मिलित हैं। भारत में नारीवाद का विकास मुख्य रूप से सामाजिक सुधार से संबंधित रहा है, जिसमें अनेक समाज सुधारकों जैसे राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, एनी बेसेंट इत्यादि ने बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा पुनर्विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया। स्वतंत्रता पश्चात भारतीय संविधान द्वारा महिलाओं को समानता एवं शिक्षा का कानूनी आधार सुनिश्चित किया गया। समकालीन समाज में नारीवाद के अंतर्गत लैंगिक न्याय, समान वेतन, राजनीतिक भागीदारी जैसे अन्य विषय सम्मिलित हैं, जिसका उद्देश्य स्त्री व पुरुष के परस्पर सहयोग से न्याय तथा समानता पर आधारित एक स्वस्थ मानवीय समाज का निर्माण करना है जहाँ दोनों को एक समान अधिकार, गरिमापूर्ण सहभागिता एवं सक्रिय नागरिक के रूप में सामाजिक भागीदारी प्राप्त हो।
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