सिरोही अंचल के उपेक्षित जैन मंदिर स्थल और उनका पुरातात्विक संरक्षण: एक स्रोत-आधारित अध्ययन: स्थल-सूची, स्थापत्य साक्ष्य, जोखिम और संरक्षण-रणनीति

Authors

  • डॉ. सीमा चारण

Keywords:

सिरोही, जैन मंदिर, चन्द्रावती, देलवाड़ा, मारू-गुर्जर स्थापत्य, पुरातात्त्विक संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत, डिजिटल अभिलेखीकरण, जोखिम-मानचित्रण, विरासत प्रबंधन

Abstract

सिरोही अंचल पश्चिमी राजस्थान के उन सांस्कृतिक भू-दृश्यों में है जहाँ जैन धर्म, व्यापारिक मार्गों, राजकीय संरक्षण और मारू-गुर्जर स्थापत्य परम्परा ने दीर्घकालिक अंतःक्रिया विकसित की। माउंट आबू का देलवाड़ा मंदिर-समूह इस विरासत का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण है, परन्तु इसके समानांतर अनेक छोटे, कम-प्रसिद्ध, पुनर्निर्मित, अवशेषात्मक अथवा सीमित रूप से प्रलेखित जैन मंदिर स्थल भी विद्यमान हैं। यह शोध-पत्र इन्हीं स्थलों को 'उपेक्षित' कहने के लिए एक सावधान कार्यपरिभाषा अपनाता है—अर्थात् ऐसे स्थल जिनकी सार्वजनिक दृश्यता, पुरातात्त्विक व्याख्या या संरक्षण-प्रलेखन प्रमुख तीर्थ-स्थलों की तुलना में सीमित है; इसे स्वतः भौतिक जर्जरता का प्रमाण नहीं माना गया है। अध्ययन IGNCA के सिरोही पुरातात्त्विक स्थल अभिलेख, राजस्थान सरकार के देवस्थान अभिलेख, चन्द्रावती के उत्खनन-साहित्य तथा जैन मंदिर स्थापत्य पर उपलब्ध सहकर्मी-समीक्षित शोध पर आधारित है। चयनित स्थलों में चन्द्रावती के जैन अवशेष, बामनुसर के विमलनाथ एवं उपसरग मंदिर, अबू तलहटी का आदेश्वर मंदिर तथा IGNCA में सूचीबद्ध अन्य जैन मंदिर शामिल हैं। अध्ययन का प्रमुख निष्कर्ष यह है कि संरक्षण की सबसे बड़ी समस्या केवल संरचना की मरम्मत नहीं, बल्कि स्थल-स्तरीय पहचान, डिजिटल दस्तावेजीकरण, स्वामित्व/संरक्षण स्थिति की स्पष्टता, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और नियमित निगरानी के बीच समन्वय का अभाव है। इसलिए यह शोध एक 'दस्तावेजीकरण → जोखिम-मूल्यांकन → न्यूनतम हस्तक्षेप → स्थानीय प्रबंधन → डिजिटल निगरानी' मॉडल प्रस्तावित करता है।

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डॉ. सीमा चारण. (2026). सिरोही अंचल के उपेक्षित जैन मंदिर स्थल और उनका पुरातात्विक संरक्षण: एक स्रोत-आधारित अध्ययन: स्थल-सूची, स्थापत्य साक्ष्य, जोखिम और संरक्षण-रणनीति. Kavya Setu, 2(9), 35–46. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/365

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