भूमि संसाधनों का उपयोग: सम-सीमांत उपयोगिता सिद्धांत
Keywords:
उच्चावच, जलवायु, मृदा, वनस्पतिAbstract
भूमि संसाधन को किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी माना जाता है। मानव सभ्यता के आरंभ से ही भूमि को अत्यधिक महत्व प्राप्त रहा है — इसे जीवन की आत्मा तक कहा गया है। प्राचीन काल में राजा की शक्ति उसकी अधीन भूमि की परिमाण से आँकी जाती थी। यद्यपि आधुनिक समय में भूमि संसाधनों के उपयोग में विविधता और परिवर्तन आ गया है, फिर भी इसकी महत्ता घटने के बजाय और अधिक बढ़ गई है क्योंकि बढ़ती जनसंख्या और आवश्यकताओं ने इस पर दबाव बढ़ा दिया है।
यह एक विडंबनापूर्ण तथ्य है कि संपूर्ण मानवीय गतिविधियाँ इसी भूमि पर आधारित हैं, फिर भी इसकी सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक उपेक्षा बरती गई। जैसे-जैसे समय बदला, मानव ने भूमि के महत्व को समझा और इसके संरक्षण व समुचित उपयोग के लिए भूमि नियोजन और प्रबंधन के क्षेत्र में प्रयास आरंभ किए। समस्याएँ तब शुरू हुईं जब मनुष्य ने स्वयं को भूमि का सर्वोच्च स्वामी मानते हुए इसका अंधाधुंध दोहन प्रारंभ कर दिया। प्रारंभ में भूमि का उपयोग मुख्यतः कृषि कार्यों तक सीमित था, लेकिन बाद में खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से मुद्दा और अधिक जटिल होता गया। हर-भरे जंगलों को काटकर कृषि भूमि में परिवर्तन किया गया, जो सीमित भूमि के संतुलन में बाधा बनी। हालांकि अब लघुक्षेत्र भूमि का उपयोग न सिर्फ खेती के लिए होने लगगया है अपितु औद्योगिक विकास, आवासीय परियोजनाएँ, मनोरंजन स्थल और बुनियादी ढाँचे के लिए भी किया जा रहा है। इससे भूमि की जैविक गुणवत्ता और पारिस्थितिकीय संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ने लगे।
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