हरित क्रांति के पश्चात कृषि के बदलते स्वरूप और उसके प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Authors

  • प्रेम वर्मा

Keywords:

हरित क्रांति, कुपोषण, गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का

Abstract

हरित क्रांति शब्द का तात्पर्य वैश्विक स्तर पर आधुनिक तकनीकों और उपकरणों के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादन को बढ़ाने की प्रक्रिया से है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी क्रांतिकारी पहल थी, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादकता में तीव्र वृद्धि करना था। विश्व के अनेक देशों में पारंपरिक कृषि प्रणाली पर ही निर्भरता होने के कारण कृषि उत्पादन सीमित था, जबकि जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी। इस असंतुलन के कारण कई देशों को खाद्यान्न संकट और भूखमरी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता था। भारत भी इन्हीं समस्याओं से जूझ रहा था। इन चुनौतियों से निपटने के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने की आवश्यकता महसूस की गई। इसमें उच्च उत्पादकता वाले बीजों का उपयोग, उन्नत सिंचाई सुविधाएँ, ट्रैक्टर जैसे यांत्रिक उपकरण, कीटनाशकों और उर्वरकों का संतुलित उपयोग शामिल था। इन उपायों को अपनाकर कृषि क्षेत्र में तीव्र और सशक्त सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए गए। खाद्य आपूर्ति की तुलना में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या को देखते हुए तत्काल प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता थी। यही प्रयास जब संगठित रूप में सामने आया, तो इसे ष्हरित क्रांतिष् कहा गया। इस पहल ने विश्व स्तर पर कृषि के स्वरूप को ही बदल दिया और एक नए युग की शुरुआत की, जिसे आज हम हरित क्रांति के रूप में जानते हैं।

References

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Published

28-02-2025

How to Cite

प्रेम वर्मा. (2025). हरित क्रांति के पश्चात कृषि के बदलते स्वरूप और उसके प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. Kavya Setu, 1(2), 20–26. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/46

Issue

Section

Original Research Articles