भूमि संसाधनों का उपयोगः सम-सीमांत उपयोगिता सिद्धांत

Authors

  • प्रेम वर्मा

Keywords:

उच्चावच्च, जलवायु, मृदा, वनस्पति

Abstract

भूमि संसाधन को किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी माना जाता है। मानव सभ्यता के आरंभ से ही भूमि को अत्यधिक महत्व प्राप्त रहा है कृ इसे जीवन की आत्मा तक कहा गया है। प्राचीन काल में राजा की शक्ति उसकी अधीन भूमि की परिमाण से आँकी जाती थी। यद्यपि आधुनिक समय में भूमि संसाधनों के उपयोग में विविधता और परिवर्तन आ गया है, फिर भी इसकी महत्ता घटने के बजाय और अधिक बढ़ गई है क्योंकि बढ़ती जनसंख्या और आवश्यकताओं ने इस पर दबाव बढ़ा दिया है।
यह एक विडंबनापूर्ण तथ्य है कि संपूर्ण मानवीय गतिविधियाँ इसी भूमि पर आधारित हैं, फिर भी इसकी सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक उपेक्षा बरती गई। जैसे-जैसे समय बदला, मानव ने भूमि के महत्व को समझा और इसके संरक्षण व समुचित उपयोग के लिए भूमि नियोजन और प्रबंधन के क्षेत्र में प्रयास आरंभ किए। समस्याएँ तब शुरू हुईं जब मनुष्य ने स्वयं को भूमि का सर्वोच्च स्वामी मानते हुए इसका अंधाधुंध दोहन प्रारंभ कर दिया। प्रारंभ में भूमि का उपयोग मुख्यतः कृषि कार्यों तक सीमित था, लेकिन बाद में रेत, खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से मृदा की उर्वरता घटने लगी। हरे-भरे जंगलों को काटकर कृषि भूमि में परिवर्तित किया गया, जो सीमित रूप में तो प्रकृति के संतुलन में बाधा नहीं बना, लेकिन जब लालचवश भूमि का उपभोग निजी स्वार्थ के लिए होने लगाकृजैसे कि औद्योगिक विकास, आवासीय परियोजनाएं, मनोरंजन स्थल और बुनियादी ढाँचेकृतब भूमि की जैविक गुणवत्ता और पारिस्थितिकीय संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ने लगे।

References

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Published

14-07-2025

How to Cite

प्रेम वर्मा. (2025). भूमि संसाधनों का उपयोगः सम-सीमांत उपयोगिता सिद्धांत. Kavya Setu, 1(7), 1–7. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/41

Issue

Section

Original Research Articles