राष्ट्र निर्माण में गाँधीजी का राष्ट्रवादी दर्शन एक समालोचनात्मक अध्ययन

Authors

  • रघुवीर दान चारण
  • डॉ. विनय कुमार

Keywords:

गाँधीजी, राष्ट्रवाद सत्य, अहिंसा, आत्मनिर्भरता

Abstract

महात्मा गाँधी का राष्ट्रवादी दर्शन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के केंद्र में रहा है। उनका राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों पर आधारित समग्र विकास की परिकल्पना करता था। गाँधीजी का राष्ट्रवाद हिंसा से रहित, नैतिकता आधारित और जनसहभागिता पर केंद्रित था। उनके अनुसार भारत का निर्माण केवल शासन परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के आत्मिक उत्थान से संभव है। गाँधीजी ने ‘स्वराज’ की संकल्पना को केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे आत्मनिर्भरता, आत्मशुद्धि और सामाजिक समरसता से जोड़ा। ग्राम स्वराज, खादी, स्वदेशी, और अस्पृश्यता उन्मूलन जैसे आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में आत्मबल और आत्मगौरव की भावना का संचार किया। उनका राष्ट्रवाद बहिष्कार या घृणा पर आधारित नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव, सत्य और अहिंसा जैसे मूल्यों पर टिका था। समालोचनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो गाँधीजी का राष्ट्रवादी चिंतन औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष से आगे जाकर, एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर इंगित करता है जो नैतिक, आत्मनिर्भर और न्यायसंगत हो। आज के वैश्विक और उपभोक्तावादी संदर्भ में गाँधीवादी राष्ट्रवाद की पुनःप्रासंगिकता को समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है, जिससे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में संतुलन और मानवीयता बनी रहे।

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Published

30-06-2025

How to Cite

रघुवीर दान चारण, & डॉ. विनय कुमार. (2025). राष्ट्र निर्माण में गाँधीजी का राष्ट्रवादी दर्शन एक समालोचनात्मक अध्ययन. Kavya Setu, 1(6), 29–35. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/40

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