औपनिवेशिक काल में आर्य समाज का इतिहास लेखनः प्रवृत्तियाँ और वैचारिक दृष्टिकोण
Keywords:
औपनिवेशिक काल, आर्य समाज, इतिहास लेखन, राष्ट्रवाद, वैचारिक दृष्टिकोण, सामाजिक सुधारAbstract
औपनिवेशिक काल भारत के सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक इतिहास में गहन परिवर्तन और पुनर्जागरण का युग था, जिसमें अनेक सुधारवादी आंदोलनों का उदय हुआ। इन्हीं आंदोलनों में आर्य समाज का विशेष महत्व है, जिसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने की थी। आर्य समाज ने वैदिक परंपराओं के पुनरुद्धार, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य औपनिवेशिक काल में आर्य समाज के इतिहास लेखन की प्रवृत्तियों और उसके वैचारिक दृष्टिकोण का सम्यक विश्लेषण करना है। इस अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि आर्य समाज से जुड़े इतिहासकारों और चिंतकों ने किस प्रकार औपनिवेशिक शासन, ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों तथा परंपरागत सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष को अपने लेखन का केंद्र बनाया। उनके लेखन में वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता, भारतीय सभ्यता की गौरवपूर्ण विरासत तथा स्वदेशी चेतना को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। आर्य समाज के इतिहासकारों ने औपनिवेशिक इतिहास लेखन की पाश्चात्य दृष्टि की आलोचना करते हुए भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास की पुर्नव्याख्या का प्रयास किया। साथ ही, उन्होंने सामाजिक सुधार, नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, जाति-भेद विरोध और शुद्धि आंदोलन जैसे विषयों को ऐतिहासिक संदर्भ में प्रस्तुत कर समाज को जागरूक करने का कार्य किया। इस शोध में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि औपनिवेशिक काल में आर्य समाज का इतिहास लेखन केवल अतीत का विवरण नहीं था, बल्कि वह राष्ट्रवादी चेतना, सांस्कृतिक आत्मबोध और सामाजिक सुधार की भावना से प्रेरित एक वैचारिक आंदोलन का रूप था, जिसने भारतीय समाज को आत्मसम्मान, स्वाभिमान और स्वाधीनता की ओर अग्रसर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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