मध्यप्रदेश के ग्वालियर–चम्बल संभाग में भृष्टाचार निवारण में भृष्टाचार निरोधक कानून की प्रभावशीलता का अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.65578/kavyasetu.v2.i4.257Keywords:
भृष्टाचार, भृष्टाचार निरोधक कानून, लोकायुक्त, ग्वालियर–चम्बल संभाग, प्रशासनिक पारदर्शिताAbstract
भृष्टाचार किसी भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती है, जो प्रशासनिक पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा जन-विश्वास को कमजोर करता है। भारत में भृष्टाचार के निवारण हेतु विभिन्न विधिक प्रावधान किए गए हैं, जिनमें भृष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) एक प्रमुख कानून है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य मध्यप्रदेश के ग्वालियर–चम्बल संभाग में भृष्टाचार निवारण में भृष्टाचार निरोधक कानून की प्रभावशीलता का क्रमबद्ध एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है। अध्ययन में वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक शोध पद्धति का प्रयोग किया गया है। प्राथमिक आंकड़े साक्षात्कार एवं क्षेत्रीय अवलोकन के माध्यम से तथा द्वितीयक आंकड़े लोकायुक्त संगठन, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, न्यायिक निर्णयों, सरकारी प्रतिवेदनों एवं प्रकाशित शोध साहित्य से संकलित किए गए हैं। वर्ष 2018 से 2024 तक के आंकड़ों के आधार पर यह विश्लेषण किया गया है कि शिकायतों, पंजीकृत प्रकरणों, अभियोजन स्वीकृति तथा दोषसिद्धि की स्थिति क्या रही है।
अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ग्वालियर–चम्बल संभाग में भृष्टाचार निरोधक कानून का विधिक ढाँचा पर्याप्त है, किंतु इसके क्रियान्वयन में अनेक व्यावहारिक बाधाएँ विद्यमान हैं। अभियोजन स्वीकृति में विलंब, राजनीतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप, गवाह संरक्षण की कमी तथा लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण दोषसिद्धि की दर अपेक्षाकृत कम बनी हुई है। शोध निष्कर्ष यह इंगित करते हैं कि भृष्टाचार निरोधक कानून तभी प्रभावी सिद्ध हो सकता है, जब उसके साथ मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति, न्यायिक तत्परता तथा जन-जागरूकता का समन्वय हो।
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