रामायण में वर्णित राष्ट्र की अवधारणा

Authors

  • कुलदीप

Keywords:

दशपादी पाठ, आचार शास्त्र, रामायण में पितृभक्ति, प्रजावत्सलता, राष्ट्रप्रेम, वाल्मीकि आदिकवि

Abstract

वेद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं। चारों वेदों के अनेक सूक्तों में राष्ट्र की और संकेत किया हैं। वेदों में राष्ट्र शब्द अनेक स्थलों में प्रयुक्त हुआ है जैसे- असौ वा आदित्यो राष्ट्रम (काठक सं. 37.11) वह आदिव्य राष्ट्र है। राष्ट्र वैश्वानरः (तै॰ स॰ 5.4.7.7) राष्ट्र वैश्वानर हैं। श्री वै राष्ट्रम (श॰ व्रा॰ 6.7.37) श्री ही राष्ट्र हैं। यजुर्वेद में कहा है- ‘‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा।1 यह वाजपेय याग से संबंधित मंत्रसमूह का एक मंत्र है इसमें राजा अग्नि में आहुति प्रदान करता हुआ राजा कहता है कि मधुमय जल से अभिव्यक्ति हम अपने राष्ट्र में सर्वदा अग्रसर रूप में जागरूक रहें। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि राजा का वरण प्रजाएं राजकर्म के लिए करती हैं, तथा इसे राष्ट्र के सर्वोच्च स्थान पर आसीन करती हैं।

References

यजुर्वेद 5/23

अथर्ववेद-3/4/2

वहीं-11.5.17

A SANSKRIT-ENGLISH DICTIIONARY-SIR MONIER-WILLIAMS P.N.- 879

संस्कृत-हिन्दी कोश-वामन शिवराम आप्टे, पृ॰ स॰ 853

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How to Cite

कुलदीप. (2026). रामायण में वर्णित राष्ट्र की अवधारणा. Kavya Setu, 2(8), 1–5. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/327

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