आधुनिक हिंदी साहित्य में समाज और राजनीति का चित्रण: प्रमुख रचनाकारों की कृतियों का आलोचनात्मक अध्ययन
Keywords:
आधुनिक हिंदी साहित्य, समाज, राजनीति, सामाजिक यथार्थ, लोकतंत्र, जाति, सांप्रदायिकता, प्रतिरोधAbstract
यह शोध-लेख आधुनिक हिंदी साहित्य में समाज और राजनीति के अंतर्संबंधों का आलोचनात्मक परीक्षण करता है। अध्ययन का आधार आठ प्रतिनिधि कृतियाँ हैं—प्रेमचंद का “गोदान”, फणीश्वरनाथ रेणु का “मैला आँचल”, यशपाल का “झूठा सच”, भीष्म साहनी का “तमस”, श्रीलाल शुक्ल का “राग दरबारी”, मन्नू भंडारी का “महाभोज”, ओमप्रकाश वाल्मीकि की “जूठन” और उदय प्रकाश का “मोहनदास”। शोध में गुणात्मक, व्याख्यात्मक एवं तुलनात्मक विषयवस्तु-विश्लेषण अपनाया गया है। सामाजिक संरचना, वर्ग, जाति, लैंगिकता, सांप्रदायिकता, ग्रामीण जीवन, राज्य-संस्थाएँ, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ, राजनीतिक संरक्षण, प्रतिरोध और नागरिक चेतना को प्रमुख विश्लेषण-श्रेणियों के रूप में निर्धारित किया गया। निष्कर्ष संकेत करते हैं कि आधुनिक हिंदी साहित्य समाज का निष्क्रिय दर्पण नहीं, बल्कि सत्ता-संबंधों का अनावरण करने वाला आलोचनात्मक सार्वजनिक क्षेत्र है। “गोदान” औपनिवेशिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामंती शोषण को, “मैला आँचल” स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के ग्रामीण संक्रमण को, “झूठा सच” विभाजन और राष्ट्र-निर्माण के अंतर्विरोधों को तथा “तमस” सांप्रदायिक राजनीति की संगठित प्रकृति को उद्घाटित करता है। “राग दरबारी” और “महाभोज” लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण, अपराध-राजनीति गठजोड़ और जनमत-निर्माण की विकृतियों को सामने लाते हैं; “जूठन” जाति-सत्ता के अनुभवजन्य यथार्थ को केंद्र में लाती है, जबकि “मोहनदास” उदारीकरणोत्तर व्यवस्था में पहचान, रोजगार और न्याय के संस्थागत अपहरण को रेखांकित करता है। अध्ययन का मुख्य प्रतिपादन यह है कि साहित्यिक यथार्थ घटनाओं की प्रतिलिपि नहीं, बल्कि चयन, भाषा, दृष्टिकोण और शिल्प के माध्यम से निर्मित सामाजिक-राजनीतिक व्याख्या है।
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