सहकारी आंदोलन और राजनीति: भारत में वैश्वीकरण की दिशा और परिणाम
Keywords:
सहकारी आंदोलन, राजनीति, वैश्वीकरण, लोकतंत्रAbstract
भारत में सहकारी आंदोलन प्रारंभ से ही किसानों और ग्रामीण समाज की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने का माध्यम रहा है, लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीति और सत्ता-संतुलन से गहराई से जुड़ गया। सहकारी समितियाँ केवल आर्थिक संगठन नहीं रहीं, बल्कि नेतृत्व निर्माण और वोट-बैंक की राजनीति का साधन बन गईं। स्वतंत्रता के बाद पंचवर्षीय योजनाओं में सहकारिता को विकास का आधार माना गया, किंतु राजनीतिक हस्तक्षेप ने इसकी कार्यकुशलता और पारदर्शिता को प्रभावित किया। 1991 के बाद जब वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीतियाँ आईं, तो सहकारी आंदोलन के सामने नए अवसर और चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं। एक ओर वैश्विक बाजार तक पहुँच, निर्यात की संभावना और तकनीकी सहयोग ने सहकारिता को मजबूत किया, वहीं दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा और निजीकरण के दबाव ने इसकी स्वायत्तता को कमजोर किया। महाराष्ट्र की चीनी सहकारी समितियों और गुजरात की डेयरी सहकारिताओं के उदाहरण बताते हैं कि राजनीति ने सहकारिता को ग्रामीण नेतृत्व और सत्ता हासिल करने का उपकरण बना दिया। नतीजतन, सहकारी आंदोलन अब दोहरी स्थिति में है—यह विकास और लोकतंत्र को सशक्त भी करता है और राजनीतिकरण व भ्रष्टाचार के कारण कमजोर भी। इस प्रकार भारत में सहकारी आंदोलन और राजनीति का संबंध वैश्वीकरण की दिशा और परिणामों से गहराई से प्रभावित है।
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