महिला आरक्षण और लोकतंत्र का सशक्तिकरण: एक सैद्धांतिक दृष्टिकोण

Authors

  • रचना देवी, प्रो॰ (डॉ॰) मीनाक्षी शर्मा

Keywords:

महिला आरक्षण, पंचायती राज, लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व, फेमिनिस्ट थ्योरी, प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व, राजनीतिक भागीदारी, सशक्तिकरण, सबाल्टर्न सिद्धांत, स्थानीय शासन।

Abstract

भारतीय लोकतंत्र में पंचायती राज संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण, स्थानीय शासन की नींव को मजबूत करता है। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) के अंतर्गत महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था ने राजनीतिक क्षेत्र में लैंगिक प्रतिनिधित्व को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की। यह शोध-पत्र महिला आरक्षण के माध्यम से लोकतंत्र के सशक्तिकरण का एक सैद्धांतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गहराई से समझने का प्रयास किया गया है।
यह शोध-पत्र हन्ना पिटकिन की प्रतिनिधित्व सिद्धांत, फेमिनिस्ट पॉलिटिकल थ्योरी और सबाल्टर्न थ्योरी जैसे सैद्धांतिक फ्रेमवर्क पर आधारित है। शोध में यह विश्लेषण किया गया है कि महिला आरक्षण क्या केवल सांकेतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित है या उसने महिलाओं की ‘राजनीतिक एजेंसी’ को भी विकसित किया है। प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व, पितृसत्तात्मक अवरोध, तथा सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों की भूमिका को ध्यान में रखते हुए यह शोध यह दर्शाता है कि आरक्षण की पहल ने महिलाओं की भागीदारी के लिए आवश्यक मंच तो प्रदान किया है, परंतु उनके सशक्तिकरण के लिए केवल कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं।
शोध-पत्र में यह भी सामने आता है कि पंचायतों में महिला नेताओं ने कई स्थानों पर बाल विवाह, स्वच्छता, शिक्षा जैसे मुद्दों पर सकारात्मक हस्तक्षेप किया है, जिससे लोकतंत्र की समावेशी प्रकृति को बल मिला है। अंततः, यह शोध महिला आरक्षण को लोकतंत्र की गुणवत्ता में सुधार की एक प्रभावी रणनीति के रूप में प्रस्तुत करता है, बशर्ते इसके साथ संस्थागत समर्थन, प्रशिक्षण और सामाजिक जागरूकता की रणनीतियाँ भी लागू की जाएँ।

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Published

10-09-2025

How to Cite

रचना देवी, प्रो॰ (डॉ॰) मीनाक्षी शर्मा. (2025). महिला आरक्षण और लोकतंत्र का सशक्तिकरण: एक सैद्धांतिक दृष्टिकोण. Kavya Setu, 1(9), 63–71. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/92

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