रत्नकुमार सांभरिया की कहानियों में स्त्री की भाषिक चेतना
Keywords:
भाषिक चेतना, दलित स्त्री, प्रतिरोध, लोकभाषा, रत्नकुमार सांभरियाAbstract
रत्नकुमार सांभरिया की कहानियों में स्त्री की भाषिक चेतना एक विशिष्ट विमर्श के रूप में उभरती है, जहाँ स्त्री की आवाज़ केवल संवादों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रतिरोध, आत्मसम्मान और सामाजिक जागरूकता का स्वर धारण कर लेती है। उनकी कहानियों में स्त्री पात्र भाषा को अभिव्यक्ति के साधन की बजाय संघर्ष के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। देशज शब्दावली, लोक मुहावरों और तीखे वाक्यों के माध्यम से वे पितृसत्ता, जातिगत भेदभाव और सांस्कृतिक रूढ़ियों को चुनौती देती हैं। सांभरिया स्त्री-भाषा को केवल रूपकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभवों और सामाजिक संरचना में उनकी स्थिति को उजागर करने वाला उपकरण बनाते हैं। इस प्रकार उनकी कहानियाँ दलित स्त्री की भाषिक चेतना को न केवल संवेदनात्मक गहराई देती हैं, बल्कि उसे समाज परिवर्तन की दिशा में सक्रिय शक्ति के रूप में स्थापित करती हैं।
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