महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री का मनोवैज्ञानिक आत्मबोध

Authors

  • Dhodare Sarika Ramchandra, Dr. Rajendra Baviskar

Keywords:

स्त्री आत्मबोध, मनोवैज्ञानिक चेतना, अंतर्मन, आत्मसंघर्ष, संवेदनात्मक अनुभव

Abstract

यह अध्ययन महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री के मनोवैज्ञानिक आत्मबोध का विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें उनके काव्य और गद्य में निहित स्त्री-अंतर्मन की संवेदनाएँ, आत्मसंघर्ष, पीड़ा, एकाकीपन और आत्मसम्मान की चेतना को केंद्र में रखा गया है। महादेवी वर्मा ने स्त्री को केवल सामाजिक बंधनों से पीड़ित व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि एक अंतर्मुखी, आत्मविश्लेषी और चेतन सत्ता के रूप में चित्रित किया है, जो अपने अस्तित्व और गरिमा के प्रति सजग है। उनके साहित्य में स्त्री की मानसिक स्थिति सामाजिक दमन, भावनात्मक उपेक्षा और सांस्कृतिक रूढ़ियों के प्रभाव से निर्मित जटिल मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं के रूप में उभरती है। यह अध्ययन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि महादेवी वर्मा का लेखन स्त्री के अंतर्मन की सूक्ष्म अनुभूतियों को अभिव्यक्त करते हुए उसे आत्मबोध, आत्मसम्मान और मानसिक स्वतंत्रता की दिशा में प्रेरित करता है, जिससे उनका साहित्य नारी मनोविज्ञान के अध्ययन हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाता है।

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Published

17-10-2025

How to Cite

Dhodare Sarika Ramchandra, Dr. Rajendra Baviskar. (2025). महादेवी वर्मा के साहित्य में स्त्री का मनोवैज्ञानिक आत्मबोध. Kavya Setu, 1(10), 119–129. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/168

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