हरियाणा में कृषि ऋण व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

Authors

  • सर्वजीत
  • सर्वजीत
  • डाॅ. अशोक कुमार

Keywords:

कृषि ऋण व्यवस्था, हरियाणा, हरित क्रांति, सहकारी समितिया, भूमि विकास बैंक, संस्थागत ऋण, असंस्थागत ऋण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि आधुनिकीकरण।

Abstract

यह अध्ययन हरियाणा में कृषि ऋण व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विकास प्रक्रिया तथा इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। शोध में विशेष रूप से 1966 के बाद की परिस्थितियों का अध्ययन किया गया है। 1966 में हरियाणा राज्य के गठन तथा हरित क्रांति की शुरुआत ने कृषि संरचना में व्यापक परिवर्तन किए, जिससे कृषि उत्पादन, तकनीकी विकास तथा पूंजी की आवश्यकता में वृद्धि हुई। हरित क्रांति से पूर्व कृषि व्यवस्था मुख्यतः पारंपरिक, वर्षा आधारित एवं आत्मनिर्भर थी तथा किसान साहूकारों और महाजनों जैसे असंस्थागत स्रोतों पर निर्भर थे, जिससे शोषण, उच्च ब्याज दर और ऋणग्रस्तता जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं। 1966 के पश्चात सरकार द्वारा सहकारी समितियों, भूमि विकास बैंकों, राष्ट्रीयकृत बैंकों तथा छ।ठ।त्क् जैसी संस्थाओं के माध्यम से संस्थागत ऋण प्रणाली को सुदृढ़ किया गया। किसान क्रेडिट कार्ड, ब्याज सब्सिडी, फसल बीमा तथा ऋण माफी योजनाओं ने किसानों की ऋण उपलब्धता और आर्थिक स्थिति में सुधार किया। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कृषि ऋण व्यवस्था ने हरियाणा की कृषि उत्पादकता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, तकनीकी आधुनिकीकरण तथा किसानों के जीवन स्तर में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही, यह भी पाया गया कि संस्थागत ऋण व्यवस्था के विस्तार के बावजूद कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं।

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Published

17-02-2026

How to Cite

सर्वजीत, सर्वजीत, & डाॅ. अशोक कुमार. (2026). हरियाणा में कृषि ऋण व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि. Kavya Setu, 2(2), 66–75. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/175

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