रीवा जिले में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बैंकों की गैर निष्पादित संपत्तियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन’’
DOI:
https://doi.org/10.65578/kavyasetu.v1.i3.203Keywords:
गैर निष्पादित संपत्तियाँ (NPAs), सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, प्राथमिकता क्षेत्र, गैर-प्राथमिकता क्षेत्र।Abstract
किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में बैंकिंग क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक सुदृढ़ और स्वस्थ बैंकिंग प्रणाली किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है। गैर निष्पादित संपत्तियाँ (NPAs) बैंकिंग उद्योग के स्वास्थ्य का सबसे सटीक संकेतक हैं; अर्थात, ये बैंकों के प्रदर्शन को दर्शाते हैं। बैंकिंग क्षेत्र के NPAs भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं। गैर निष्पादित संपत्तियों का बैंकों की तरलता (liquidity), शोधन क्षमता (solvency) और लाभप्रदता (profitability) पर सीधा प्रभाव पड़ता है। प्रस्तुत अध्ययन भारतीय सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के प्रदर्शन का विश्लेषण करता है, जिसमें विशेष रूप से उनके NPAs पर ध्यान केंद्रित किया गया है। निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच एक तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है, जिसका आधार कुल सकल अग्रिमों (gross advances) के प्रतिशत के रूप में NPAs का अनुपात और क्षेत्र-वार औसत NPAs का प्रतिशत है। विश्लेषण के उद्देश्य से, NPAs को प्राथमिकता (priority) और गैर-प्राथमिकता (non-priority) वाले क्षेत्रों में भी वर्गीकृत किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में NPAs का स्तर निजी क्षेत्र के बैंकों की तुलना में अधिक है। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों के बैंकों में ‘‘बैंक ऑफ इंडिया’’ के औसत गैर निष्पादित संपत्तियाँ सर्वाधिक हैं, जबकि 'HDFC बैंक’’ के औसत NPAs सबसे कम हैं। इसके अतिरिक्त, गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्र में ‘‘बैंक ऑफ इंडिया’’ के NPAs सर्वाधिक हैं, जबकि प्राथमिकता वाले क्षेत्र में 'YES cSad' के औसत NPAs सबसे कम हैं।
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