सांख्यदर्शन में दुःखत्रय एवं कैवल्य की अवधारणा: एक समीक्षात्मक अध्ययन

Authors

  • उषा खत्री

Keywords:

सांख्यदर्शन, दुःखत्रय, विवेकख्याति, पुरुष, प्रकृति, कैवल्य, मोक्ष

Abstract

भारतीय दार्शनिक परम्परा का मूल प्रयोजन मानव जीवन में व्याप्त दुःखों की यथार्थ पहचान कर उनकी आत्यन्तिक निवृत्ति के उपायों का प्रतिपादन करना है। भारतीय आस्तिक एवं नास्तिक दर्शनों में दुःख, बन्धन तथा मोक्ष के सम्बन्ध में विविध मत प्रतिपादित किए गए हैं, तथापि सांख्यदर्शन इस दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि यह मानव जीवन की मूल समस्या के रूप में दुःख को स्वीकार करते हुए उसके स्वरूप, कारण एवं निवारण के उपायों का अत्यन्त क्रमबद्ध, तार्किक तथा वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करता है। ईश्वरकृष्णकृत सांख्यकारिका के प्रथम कारिका में उल्लिखित “दुःखत्रयाभिघात” का सिद्धान्त सांख्यदर्शन के सम्पूर्ण तात्त्विक चिन्तन की आधारभूमि है। सांख्य के अनुसार आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक दुःखों से पीड़ित मानव स्वाभाविक रूप से ऐसे साधन की खोज करता है, जो उसे समस्त क्लेशों से स्थायी मुक्ति प्रदान कर सके। सांख्यदर्शन इस समस्या का समाधान पुरुष एवं प्रकृति के यथार्थ विवेकज्ञान में निहित मानता है।
प्रस्तुत शोधपत्र में सांख्यदर्शन में प्रतिपादित दुःखत्रय की अवधारणा, दुःख के मूल कारणों, अविवेक, त्रिगुणात्मक प्रकृति, पुरुष-प्रकृति सम्बन्ध, विवेकख्याति तथा कैवल्य की अवधारणा का समीक्षात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। साथ ही वर्तमान समय में बढ़ते मानसिक तनाव, अस्तित्वगत संकट तथा मूल्यहीनता के परिप्रेक्ष्य में सांख्यदर्शन की शिक्षाओं की समकालीन प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है। अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि सांख्यदर्शन केवल एक दार्शनिक तन्त्र न होकर मानव जीवन को आन्तरिक संतुलन, आत्मबोध एवं स्थायी शान्ति प्रदान करने वाला व्यावहारिक जीवन-दर्शन भी है।

References

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वाचस्पति मिश्र, तत्त्वकौमुदी, चैखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, वाराणसी, 2017, पृ. 11

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How to Cite

उषा खत्री. (2026). सांख्यदर्शन में दुःखत्रय एवं कैवल्य की अवधारणा: एक समीक्षात्मक अध्ययन. Kavya Setu, 2(7), 1–16. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/298

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