सुशीला टाकभौरे के उपन्यासों में स्त्री का बदलता स्वरूप: ‘वह लड़की’ के परिप्रेक्ष्य में

Authors

  • प्रियंका शर्मा, डॉ. कंचना सक्सेना

Keywords:

स्त्री-सशक्तिकरण, दलित स्त्री-विमर्श, सामाजिक चेतना, पितृसत्ता और शोषण, प्रतिरोध और परिवर्तन

Abstract

सुशीला टाकभौरे के उपन्यासों में स्त्री का बदलता स्वरूप विशेष रूप से ‘वह लड़की’ के माध्यम से प्रभावशाली रूप में उभरकर सामने आता है। यह उपन्यास स्त्री के पारंपरिक दमन, जातिगत शोषण और पितृसत्तात्मक बंधनों को उजागर करते हुए स्त्री-चेतना, प्रतिरोध और सशक्तिकरण के नए आयाम प्रस्तुत करता है। शैला, निशा, नमिता और शम्मा जैसे पात्र केवल पीड़ित नारी का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि परिवर्तन, जागरूकता और आत्मसम्मान की प्रतीक के रूप में उभरते हैं। उपन्यास में बाल-विवाह, दहेज, पुत्र-प्रेम, घरेलू हिंसा, स्त्री-शिक्षा की उपेक्षा और सामाजिक रूढ़ियों जैसे मुद्दों को अत्यंत यथार्थपरक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। टाकभौरे स्त्री को सीमित और निष्क्रिय भूमिका से बाहर निकालकर उसे संघर्षशील, निर्णयक्षम और स्वायत्त व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार ‘वह लड़की’ दलित स्त्री-विमर्श का एक महत्त्वपूर्ण पाठ बनकर स्त्री-मुक्ति और समानता की दिशा में सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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Published

10-09-2025

How to Cite

प्रियंका शर्मा, डॉ. कंचना सक्सेना. (2025). सुशीला टाकभौरे के उपन्यासों में स्त्री का बदलता स्वरूप: ‘वह लड़की’ के परिप्रेक्ष्य में. Kavya Setu, 1(9), 72–85. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/106

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