प्रवासी हिंदी साहित्यः अवधारणा विमर्श

Authors

  • मनोज कुमार

Keywords:

मॉरिशस, भारतीय प्रवासियों, हनुमान चालीसा, इंडियन इंडेन्यन लेबर सिस्टम, रामचरितमानस

Abstract

विश्व के इतिहास में 19वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में एक ऐसी घटना घटी जिसका दूरगामी प्रभाव विश्व के साथ-साथ भारत पर भी पड़ा। विश्व के निर्जन टापुओं तथा प्राकृतिक जीवन जीने वाले और उनका दोहन करने के उद्देश्य से अपने उपनिवेश बनाने का प्रयास किया। इन देशों और टापुओं में मॉरिशस, फीजी, सूरीनाम, त्रिनिडाड और गयाना जैसे अनेक देश-टापू थे। इन देशों में भारतीयों को गुलाम और मजदूर बनाकर ले जाया गया था। ये प्रवासी गये किसी भी विवशता में हो परन्तु वहाँ के परिवेश में वे भारतीयता से अभिन्न रूप से जोड़े रखा। डॉ० गोयनका ने अपने उक्त उदाहरण में इस बात को स्पष्ट किया। जिन-जिन देश टापूओं या टापुनुमा देशों में भारतीयों को गुलाम मजादूरों के रूप में भेजा था उन देशों में उन्हें भयानक शारीरिक, मानसिक और आर्थिक यातनाओं का शिकार भी होना पड़ा। इन परिस्थितियों में रहते हुए भी प्रवासी भारतीयों ने कैरेबियन देशों में अपनी संस्कृति का सहारा भी लिया और उसकी रक्षा भी की। प्रवास का अर्थ है अपने स्थान को छोड़कर कहीं अन्यत्र जाना। डॉ० कृष्ण कुमार के अनुसार - ‘‘प्रवास शब्द ‘वस्’ धातु में प्रवास उपसर्ग लगने से बना है। ‘वस्’ धातु का प्रयोग रहने के लिए होता है। वामन शिवराम आप्टे के अनुसार प्रवास शब्द का अर्थ विदेश गमन, विदेश यात्रा, घर पर न रहना है।’’
भारतीय प्रवासियों ने अपने-अपने प्रवासी देशों में अपने संघर्ष एवम् कर्मठता से अपना एक संसार बसाया। मनोहरपुरी ने इस संघर्ष को कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया है, ‘‘मॉरिशस, फीजी, गुयाना, त्रिनिडाड और टूबैगो में भारतीय मूल के लोगों ने जो संघर्ष किया और बाद में वहाँ पर अपनी प्रतिभाओं के झंडे गाड़े। प्रवासी भारतीयों की भाषा, संस्कृति, धर्म देश-प्रेम ही उन्हें साहित्य से जोड़ता रहा तथा कालांतर में साहित्य सृजन के लिए भी प्रेरित करता रहा। प्रवासी साहित्य सृजन का प्रारम्भ 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में तब होता है जब भारत का उन देशों से सम्बन्ध जुड़ता है। इस विषय में मॉरिशस का स्थान अग्रणी रहा है। मॉरिशस की हिंदी कविता का इतिहास होली कविता (हिन्दुस्तानी 2 मार्च, 1913) से प्रारम्भ होता है। मॉरिशस के साहित्यकारों में मुनिश्वर लाल चिंतामणि, अभिमन्यु अनत, बृजेन्द्र कुमार भगत ‘मधुकर’, इंद्रदेव भोला, डॉ० वीरसेन जागा सिंह। मॉरिशस से अनुराग (1969-77), दर्पण (1975), आभा (1927-76), हमारा देश ( 1971-74), निर्वाण (1975), जनवाणी, इन्द्रधनुष (1988 से अभी तक)। फीजी में भी प्रवासी हिंदी साहित्य का पर्याप्त लेखन हो रहा है। यही स्थिति सूरीनाम, त्रिनिडाड में भी मिलती है।

References

अभिमन्यु अनत -‘प्रवासियों का गूँगा इतिहास‘ (गगनांचल), 1980, पृ. 98

अभिमन्यु अनत, भारत मेरी प्रेरणा का स्रोत रहा है, गगनांचल, 1985, अंक-4, पृ. 28-30

कमल किशोर गोयनका, हिन्दी का प्रवासी साहित्य, पृ. 13

कमल किशोर गोयनका, हिन्दी का प्रवासी साहित्य, पृ. 14

कमल किशोर, हिन्दी का प्रवासी साहित्य, पृ. 18.

कृष्ण कुमार, प्रवासी हिन्दी लेखन की पृष्ठभूमि और उसका स्वरूप, वर्तमान साहित्य, 2006, पृ. 69

जैनेन्द्र कुमार जैन, गांधी के मानवीय रूप को उभार सकता है मॉरीशस, गगनांचल, 1985, अंक-4, पृ. 20

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Published

15-01-2026

How to Cite

मनोज कुमार. (2026). प्रवासी हिंदी साहित्यः अवधारणा विमर्श. Kavya Setu, 2(1), 54–60. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/137

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