आदमी, मुखोटा और समाज: हिंदी कथा साहित्य में अस्तित्ववादी विमर्श
Keywords:
अस्तित्ववाद, हिंदी कथा साहित्य, मुखोटा, समाज, आत्मबोध, पहचान, द्वंद्व, स्वतंत्रता, आधुनिकता, आत्म-संघर्षAbstract
यह शोधपत्र हिंदी कथा साहित्य में अस्तित्ववाद के विमर्श, व्यक्ति की पहचान, सामाजिक मुखौटों और आंतरिक द्वंद्व का विश्लेषण करता है। इसमें 2000 से 2024 तक की कहानियों और उपन्यासों में पात्रों के अस्तित्वगत संकट, समाज के दबाव, आत्म-संघर्ष और मुखोटों के पीछे छिपी सच्चाई को उजागर किया गया है। यह अध्ययन दिखाता है कि हिंदी कथा साहित्य में कैसे व्यक्ति अपने अस्तित्व, स्वतंत्रता, और आत्मबोध की खोज में सामाजिक मुखौटों और बनावटी संबंधों के जटिल जाल से गुजरता है।
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