हरित क्रांति और हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तनः 1966 से 2000 तक एक ऐतिहासिक अध्ययन

Authors

  • सन्तरो कुमारी
  • डॉ. राजबीर सिंह गुलिया

Keywords:

हरित क्रांति, हरियाणा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि आधुनिकीकरण, सिंचाइ, गेहूँ-धान फसल चक्र, कृषि यंत्रीकरण, ग्रामीण परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट

Abstract

हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के इतिहास में 1966 से 2000 तक की अवधि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही। 1966 में पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के समय हरियाणा मुख्यतः कृषि प्रधान क्षेत्र था, जहाँ ग्रामीण जनसंख्या की आजीविका खेती, पशुपालन और कृषि श्रम पर आधारित थी। इसी काल में भारत में हरित क्रांति की नई कृषि रणनीति लागू हुई, जिसके अंतर्गत उच्च उपज देने वाली बीज किस्में, सिंचाई सुविधाएँ, रासायनिक उर्वरक, कृषि यंत्रीकरण, संस्थागत ऋण, मंडी व्यवस्था और सरकारी खरीद प्रणाली को प्रोत्साहन मिला। हरियाणा ने इन साधनों को तेजी से अपनाया और कुछ दशकों के भीतर देश के प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में स्थान बना लिया। प्रस्तुत शोध-पत्र में 1966-67 से 1999-2000 तक की अवधि के आधार पर हरित क्रांति के कारण हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तनों का ऐतिहासिक विश्लेषण किया गया है। आधिकारिक संशोधित आँकड़ों के अनुसार राज्य का कुल खाद्यान्न उत्पादन 1966-67 के 25.92 लाख टन से बढ़कर 1999-2000 में 130.65 लाख टन हो गया। गेहूँ उत्पादन 10.59 लाख टन से बढ़कर 96.50 लाख टन तथा धान उत्पादन 2.23 लाख टन से बढ़कर 25.83 लाख टन हो गया। इसी अवधि में सिंचाई का विस्तार, गेहूँ-धान फसल चक्र का विकास, कृषि बाजार का विस्तार, कृषि ऋण और पशुपालन का व्यावसायीकरण ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रमुख परिवर्तनकारी तत्त्व बने। दूसरी ओर, दलहनी फसलों का ह्रास, भूजल पर दबाव, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, रासायनिक निवेश पर निर्भरता और छोटे किसानों तथा कृषि मजदूरों की असुरक्षा जैसी समस्याएँ भी सामने आईं। इस प्रकार हरित क्रांति ने हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को उत्पादन और बाजार की दृष्टि से सशक्त बनाया, किन्तु इसके साथ सामाजिक और पर्यावरणीय असंतुलन भी उत्पन्न हुए।

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Published

21-05-2026

How to Cite

सन्तरो कुमारी, & डॉ. राजबीर सिंह गुलिया. (2026). हरित क्रांति और हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तनः 1966 से 2000 तक एक ऐतिहासिक अध्ययन. Kavya Setu, 2(5), 62–71. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/250

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Original Research Articles