बौद्ध एवं वेदान्त दर्शन में ज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन
Keywords:
बौद्ध दर्शन, वेदान्त दर्शन, ज्ञानमीमांसा, तुलनात्मक अध्ययन, ब्रह्मज्ञान।Abstract
भारतीय दर्शन की समृद्ध परम्परा में बौद्ध एवं वेदान्त दर्शन ज्ञानमीमांसा (Epistemology) के दो अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। दोनों दर्शनों का प्रमुख उद्देश्य सत्य की प्राप्ति एवं मानव जीवन के परम लक्ष्य की व्याख्या करना है, किन्तु ज्ञान के स्वरूप, साधनों तथा अंतिम सत्य के संबंध में इनके विचारों में उल्लेखनीय समानताएँ एवं भिन्नताएँ विद्यमान हैं। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य बौद्ध एवं वेदान्त दर्शन में ज्ञान की अवधारणा का तुलनात्मक विश्लेषण करना तथा उपलब्ध साहित्य के आधार पर उनके दार्शनिक आधारों एवं समकालीन प्रासंगिकता का मूल्यांकन करना है। यह अध्ययन पूर्णतः द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है, जिसमें उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता, त्रिपिटक, बौद्ध एवं वेदान्त साहित्य, शोध-पत्रों, पुस्तकों तथा प्रतिष्ठित विद्वानों के प्रकाशित अध्ययनों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बौद्ध दर्शन प्रत्यक्ष अनुभव, तर्क, प्रतीत्यसमुत्पाद, अनित्य एवं अनात्म के सिद्धान्तों के आधार पर ज्ञान की व्याख्या करता है तथा अज्ञान को दुःख का मूल कारण मानते हुए प्रज्ञा के माध्यम से निर्वाण की प्राप्ति पर बल देता है। इसके विपरीत वेदान्त दर्शन ब्रह्म को परम सत्य तथा आत्मा को ब्रह्म का अभिन्न स्वरूप मानते हुए श्रुति, युक्ति एवं अनुभूति के माध्यम से ब्रह्मज्ञान को मोक्ष का आधार स्वीकार करता है। तुलनात्मक अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि दोनों दर्शनों में ज्ञान केवल बौद्धिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आत्मिक एवं व्यावहारिक परिवर्तन का माध्यम भी है। साहित्य समीक्षा से यह भी स्पष्ट होता है कि आधुनिक शिक्षा, नैतिक दर्शन, मनोविज्ञान, आध्यात्मिक चिंतन तथा मानवीय मूल्यों के विकास में बौद्ध एवं वेदान्त दर्शन की ज्ञान सम्बन्धी अवधारणाएँ आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। निष्कर्षतः दोनों दार्शनिक परम्पराएँ भिन्न वैचारिक आधारों पर विकसित होने के बावजूद मानव जीवन में सत्य, विवेक, आत्मबोध, नैतिकता एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष की स्थापना में समान रूप से महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करती हैं।
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