भारतीय राजनीति में गठबंधन युग का उदय: क्षेत्रीय दलों की अनिवार्यता (1989-2014)
Keywords:
भारतीय राजनीति, गठबंधन युग, क्षेत्रीय दल, जनतांत्रिक परिपक्वता, बहुदलीय प्रणाली, राष्ट्रीय दल, मंडल आयोग, सामाजिक न्याय, एनडीए, यूपीए, अस्थिरता और स्थायित्व, दबाव की राजनीति, सत्ता साझेदारी, समावेशी लोकतंत्र, भारतीय राजनीति आदि।Abstract
भारतीय राजनीति में 1989 के बाद का दौर एक नए युग की शुरुआत माना जाता है, जिसे प्रायः “गठबंधन युग” के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस कालखंड ने एकदलीय प्रभुत्व, विशेषकर कांग्रेस के लंबे वर्चस्व, को समाप्त कर बहुदलीय और क्षेत्रीय दलों की राजनीति को केंद्र में ला खड़ा किया। सामाजिक न्याय आंदोलनों, मंडल आयोग की सिफारिशों, आर्थिक उदारीकरण और क्षेत्रीय अस्मिताओं के उभार ने भारतीय लोकतंत्र की दिशा को गहराई से प्रभावित किया। परिणामस्वरूप, केंद्र में सत्ता निर्माण के लिए राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता और सहयोग की अनिवार्यता स्वीकार करनी पड़ी।
1989 में जनता दल की सरकार से आरंभ हुआ यह गठबंधन दौर 1990 के दशक की अस्थिर सरकारों, 1998 के बाद एनडीए के उभार, और 2004-2014 के यूपीए शासन तक विस्तृत होता है। इस दौरान तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ पार्टियाँ, समाजवादी दल, वामपंथी दल तथा क्षेत्रीय शक्तियाँ निर्णायक भूमिका में रहीं। इन्होंने न केवल केंद्र की सरकारों को समर्थन दिया, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण और उनके स्वरूप को भी प्रभावित किया। शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाओं से संबंधित कई नीतियों के पीछे क्षेत्रीय दलों का दबाव और योगदान स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
इस गठबंधन युग ने चुनौतियाँ भी प्रस्तुत कीं। सरकारों की अस्थिरता, दबाव की राजनीति, भ्रष्टाचार और नीति निर्माण में निरंतरता की कमी जैसी समस्याएँ अक्सर सामने आईं। इसके बावजूद, यह दौर भारतीय लोकतंत्र की बहुलतावादी प्रकृति को मजबूत करता है। यह सिद्ध करता है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में क्षेत्रीय दल न केवल अपरिहार्य हैं, बल्कि वे लोकतंत्र को समावेशी और संतुलित बनाने में भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
अतः 1989 से 2014 तक का गठबंधन युग भारतीय राजनीति के उस संक्रमणकाल का प्रतीक है, जिसमें राष्ट्रीय राजनीति ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं और हितों को स्वीकार कर लोकतांत्रिक परिपक्वता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।
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