उपनिषदों में वाक् की उत्पत्ति ,वं स्वरूप
Keywords:
वाक, वाणी, शब्द, उपनिषद, ऋग्वेद, ब्रह्म, प्राण, मन (विचार), नाद, बिंदु, स्फोट, गायत्री, ज्ञान, चेतना, सृष्टि-तत्त्व, सौंदर्य (रस), कला-तत्त्व, उद्गीथ, साम, भाषा-दर्शनAbstract
वाणी चेतना की अमर देन है। वाणी के बिना जगत् सूना है, जीवन पंगु है। संसार के प्रायः सारे व्यवहार वाणी-व्यापार पर निर्भर हैं। सभ्यता और संस्कृति उसकी गोद में फलती फूलती है। वाणी केवल विचारों के विनिमय का ही माध्यम नहीं, अपितु विश्व में जो कुछ सत्य है, शिव है, सुन्दर है, उन सबका भी व्यञ्जक है। इस वाणी की दूसरी प्राचीन संज्ञा वाक् है। वाक् के विषय में उपनिषदों में मधुर उद्गार तथा युक्तिपूर्ण विचार भरे पड़े हैं, साथ ही उसके भौतिक, दैविक तथा आध्यात्मिक रूप की रेखा भी खींची गई है, जिसे देख आज का भाषावैज्ञानिक भी चकित रह जाता है। उपनिषद्-कालीन वाक् के स्वरूप की पीठिका वेदों में ही तैयार हो गयी थी और उसी समय इसे रहस्य की कोटि में डाल दिया गया था। जल में, थल में, औषधियों में-सभी में दैवी सत्ता को परखने वाले वैदिक ऋषि वाक् को अनुकरणमूलक या मनोरोग व्यञ्जक कैसे मान सकते थे। ऋग्वेद के अनुसार वाक् देवों से उत्पन्न हुई।
References
यः कश्च शब्दः वागेव सा।
-छा०उ०, 2.5.3
मुखाद्वाग।
-ऐ०उ०, 2.2.4
वाक् सन्धिः, जिव्हा सन्धानम्।
- तै०उ०, 2.3.4
यो व्यानः सा वाक्।
-छा०उ०, 2.3.3
भाणऋगेतांव वागभवत।
-बृ०उ०, 1.2.4
वागवास्य ज्योतिर्भवनीति वाचंवायं ज्योतिष्तस्ते।
-बृ०उ०, 4.3.5
वगानुवदति स्तनयित्नुदैदद इतिदाम्यत दत दयध्वमिति
-बृ०उ०, 5.2.3
वाग्वं गायत्रीं वाग्वा इदं सवं भूतम। गायति च त्रायते च।
-छा०उ०, 3.12.1
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