जल प्रबंधन और कृषि विकास: प्राचीन भारत की सिंचाई प्रणालियों का ऐतिहासिक विश्लेषण (ऋग्वैदिक काल से गुप्त काल)

Authors

  • करीना
  • डॉ. राज सिंह नांदल

Keywords:

जल प्रबंधन, कृषि विकास, सिंचाई प्रणाली, ऋग्वैदिक काल, गुप्त काल, जलाशय, नहरें, कुएँ।

Abstract

प्राचीन भारत में जल प्रबंधन और कृषि विकास के बीच गहरा और परस्पर निर्भर संबंध रहा है। प्रस्तुत शोध-पत्र में ऋग्वैदिक काल से गुप्त काल तक सिंचाई प्रणालियों के ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि किस प्रकार जल संसाधनों के प्रबंधन ने कृषि उत्पादन, सामाजिक संरचना और आर्थिक विकास को प्रभावित किया। ऋग्वैदिक काल में कृषि मुख्यतः वर्षा और प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर थी, जहाँ जल को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया। उत्तर वैदिक काल में स्थायी कृषि के विकास के साथ सिंचाई के कृत्रिम साधनों—जैसे कुएँ, नहरें और जलाशय—का उपयोग प्रारंभ हुआ। महाजनपद और मौर्य काल में जल प्रबंधन अधिक संगठित और राज्य-नियंत्रित प्रणाली के रूप में विकसित हुआ, जिसमें नहरों, बांधों और झीलों का निर्माण कर कृषि को सुदृढ़ बनाया गया। गुप्त काल में सिंचाई प्रणालियाँ अपने परिपक्व रूप में दिखाई देती हैं, जहाँ सामुदायिक भागीदारी, जल संरक्षण और बहु-स्रोत जल उपयोग की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से विकसित हुई। इस काल में तालाबों और जलाशयों के माध्यम से वर्षा जल संचयन तथा भूजल संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि प्राचीन भारत की जल प्रबंधन प्रणाली केवल तकनीकी नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक संगठन, आर्थिक संरचना और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ी हुई थी। अंततः यह शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि प्राचीन भारतीय सिंचाई प्रणालियाँ कृषि विकास की आधारशिला थीं और आज के जल संकट के संदर्भ में उनसे महत्वपूर्ण प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है।

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Published

04-04-2026

How to Cite

करीना, & डॉ. राज सिंह नांदल. (2026). जल प्रबंधन और कृषि विकास: प्राचीन भारत की सिंचाई प्रणालियों का ऐतिहासिक विश्लेषण (ऋग्वैदिक काल से गुप्त काल). Kavya Setu, 2(4), 9–18. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/197

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