उपनिषद् साहित्य में सृष्टि विवेचन एक अध्ययन

Authors

  • डाॅ॰ हरिओम
  • रामसिंह

Keywords:

सृष्टि-विवेचन, ब्रह्म, उपादान कारण, चेतन सत्ता, नाम-रूप, कारण-कार्य संबंध, सत्, आत्मा, अस्तित्वबोध, जीवन-दर्शन

Abstract

उपनिषदों का भारतीय दर्शन में सृष्टि-विवेचन का अपना अनूठा स्थान है। ये केवल जगत की उत्पत्ति जानने का प्रश्न ही नहीं है वास्तव में, यह उस अंतिम सत्य की खोज है, जिससे हम पूरे विश्व की रचना, व्यवस्था और उसके अस्तित्व को समझ सकते हैं। जब व्यक्ति अपने आसपास फैली दुनिया को देखता है, तो अक्सर सोच में पड़ जाता है: कैसे हुआ, इसकी जड़ क्या है, और जो ये हर समय बदलता है, क्या इसके पीछे कोई स्थायी तत्त्व भी है या इसे सिर्फ संयोग मान लें?
उपनिषद् इन सवालों के जवाब पौराणिक कहानियों या अंध-आस्थाओं के सहारे नहीं देते। वे गहरे, तर्कपूर्ण मनन से इन प्रश्नों को सुलझाते हैं। इसी वजह से, उपनिषदों में सृष्टि-विवेचन केवल ब्रह्मांड की शुरुआत का विवरण नहीं है। यह हमारे अस्तित्व में छुपे रहस्य का पता लगाने का मार्ग भी है।
इन ग्रंथों की नजर में सृष्टि का मूलाधार ब्रह्म है। ब्रह्म वही परम तत्व है, जिससे जगत का जन्म होता है, जिसमें ये टिकता है और जिसमें अंत में समा जाता है। यह ऐसा नहीं है कि कोई बाहरी निर्माणकत्र्ता ब्रह्म की तरह सब कुछ बना रहा है, अपितु ब्रह्म ही कारण भी है और उसी का विस्तार भी। सृष्टि और ब्रह्म के बीच जीवंत, गहरा रिश्ता है।
उपनिषदों में कई रूपकों और संकेतों से सृष्टि को समझाया गया है। कहीं यह ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, कहीं पर परम सत्य की शक्ति है और कहीं संसार नाम-रूप की विविधता के रूप में दिखता है। दृश्य जगत चाहे जितने अलग-अलग रूपों में फैला हो, उसकी जड़ बस एक ही तत्व है। उपनिषदों की महत्ता यही है: वे बाहरी विविधता को मानते हैं, पर उसके नीचे एक परम आधार को खोजते हैं। सृष्टि-विवेचन हमें यही सिखाता है कि बाहरी भिन्नताओं में उलझे रहना आवश्यक नहीं, वास्तविक खोज तो उनके पीछे छुपे मूल तत्व की है।
उपनिषदों का मानना है, सृष्टि के पीछे एक चेतन, व्यापक और परम सत्ता है। इसलिये सिर्फ बाहरी अध्ययन पर्याप्त नहीं; अपितु दर्शन और आध्यात्मिक नजर भी जरूरी है। सृष्टि-विवेचन दरअसल बाह्य विश्व और अंदर की चेतना के बीच सेतु का कार्य करती है।
इंसान तब अपने को अलग-थलग नहीं समझता; उसे अहसास होता है कि वो इस बड़ी व्यवस्था का भाग है। इसके चलते उसके अन्दर जिम्मेदारी, विनम्रता और समन्वय की भावना आती है और वो प्रकृति, समाज, जीवों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बन जाता है। ऐसे में, सृष्टि-विचार न सिर्फ तर्क या ज्ञान की भूख मिटाता है, अपितु जीवन की दृष्टि को पूरी तरह बदल देता है।

References

ऐतरेयोपनिषद्, ह्यूम, रॉबर्ट अर्नेस्ट, 1921, दि थर्टीन प्रिन्सिपल उपनिषद्स, ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

बृहदारण्यकोपनिषद, ह्यूम, रॉबर्ट अर्नेस्ट, 1921, दि थर्टीन प्रिन्सिपल उपनिषद्स, ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

छांदोग्योपनिषद्, ह्यूम, रॉबर्ट अर्नेस्ट, 1921, दि थर्टीन प्रिन्सिपल उपनिषद्स, ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

तैत्तिरीयोपनिषद्, ह्यूम, रॉबर्ट अर्नेस्ट, 1921, दि थर्टीन प्रिन्सिपल उपनिषद्स, ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

मुण्डकोपनिषद्, ह्यूम, रॉबर्ट अर्नेस्ट, 1921, दि थर्टीन प्रिन्सिपल उपनिषद्स, ऑक्सफोर्ड: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

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Published

26-03-2026

How to Cite

डाॅ॰ हरिओम, & रामसिंह. (2026). उपनिषद् साहित्य में सृष्टि विवेचन एक अध्ययन. Kavya Setu, 2(3), 127–136. Retrieved from https://kavyasetu.com/index.php/j/article/view/222

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