वीर सावरकर का हिन्दुत्व और दर्शन: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक अवलोकन
Keywords:
वीर सावरकर, सामाजिक समरसता, आत्मनिर्भरता, हिन्दुत्व, पवित्र भूमि, दर्शनAbstract
सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को वर्तमान महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागूर गांव में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सावरकर बंधु मित्र मेला में सक्रिय थे, जो एक गुप्त समाज था, जिसका उद्देश्य सशस्त्र बल के उपयोग से भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त करना था। वीर सावरकर ने पुणे में फग्र्यूसन कॉलेज में पढ़ाई कीः उनके जीवनी लेखक, धनंजय कीर ने नोट किया कि सावरकर ने अपने आस-पास छात्रों के एक समूह को इकट्ठा किया, जिन्होंने यूरोपीय राजनीतिक ग्रंथों पर बहस की, क्रांति पर चर्चा की, और स्वदेशी (आत्मनिर्भरता) का समर्थन किया। सावरकर के लिए, हिंदुत्व हिंदू जीवन शैली के सार का प्रतिनिधित्व करता था। जैसा कि उन्होंने लिखा, “यदि विदेशी विकास का कोई शब्द है तो वह हिंदू धर्म है और इसलिए हमें अपने विचारों को इस नए उलझे हुए शब्द से भ्रमित नहीं होने देना चाहिए।“ अपनी मातृभूमि के प्रति हिंदुओं की भक्ति सर्वोच्च थी; वास्तव में, जो भी हिंदुस्तान के प्रति समर्पित था, और उसे अपनी पवित्र भूमि (पुण्यभूमि) मानता था, वह हिंदू था। हिन्दुत्व को व्याख्या करते हुए हम केवल धर्म की सीमा में अपने प्रयत्न को बांधना नहीं चाहते। हिन्दुत्व शब्द हिन्दू जाति की सर्वमुखी प्रगतियों विचारों और कार्यों का प्रतिनिधि है। ‘हिन्दुत्व’ नाम का आज जो अर्थ है- वह समस्त हिन्दू जाति के असंख्य कार्यों का परिणाम है। ‘हिन्दुत्व’ शब्द अब एक नाम नहीं बल्कि इतिहास बन चुका है। यह भूल है कि इस नाम के साथ केवल हिन्दुओं के धार्मिक व दार्शनिक विचारों का इतिहास जुड़ा हुआ है।
References
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